9. प्रांतवादी सोच : दूसरे प्रांत के लोगों को हिन्दी से कोई दिक्कत नहीं है, क्योंकि हिन्दी किसी प्रांत की भाषा नहीं है यह सारे देश भी भाषा है, जो सभी देशवासियों ने विकसित की है। जिन्हें आप हिन्दी प्रदेश कहते हैं उनमें मारवाड़ी, मेवाती, मालवी, निमाड़ी, अवधी, बघेली, छत्तीसगढ़ी, हरियाणवी, ब्रज, कन्नौजी, बुंदेली, भोजपुरी, मगही, पहाड़ी, कुमाऊंनी, गढ़वाली आदि भाषाएं बोली जाती हैं।

प्रांतवाद की राजनीति करने वालों ने ही हिन्दी का विरोध खड़ा किया, जो कि इस देश के लिए घातक सिद्ध हुआ। अहिन्दी प्रांत के कुछ मुट्ठीभर लोग जो राजनीति कर रहे हैं, दरअसल वे उस नींव को हिला रहे हैं जिस पर सभी टिके हुए हैं। हिन्दी बचेगी तो दूसरी भारतीय भाषाएं भी बचेंगी। हिन्दी मरेगी तो असमिया, तमिल, मराठी और बंगाली भी देर-सबेर 100 फीसदी मारी जाएंगी।
10. केंद्र और राज्य सरकारें : केंद्र और राज्य सरकारों के अधीन सभी विभागों के अधिकतर कार्य अंग्रेजी में होने लगे हैं, जैसे पत्रों का आदान-प्रदान, सर्कुलर निकालना, आदेश पारित करना, महत्वपूर्ण जानकारी या सूचना अंग्रेजी में देना।
पिछले 68 सालों से सरकार के सभी संकल्प, सामान्य आदेश, नियम, अधिसूचनाएं, प्रशासनिक तथा अन्य रिपोर्टें, प्रेस विज्ञप्तियां, संसद के किसी एक या दोनों सदनों के समक्ष रखी जाने वाली प्रशासनिक तथा अन्य रिपोर्टें, सरकारी कामकाज, संविदाएं, करार, अनुज्ञप्तियां, अनुज्ञा पत्र, टेंडर नोटिस और टेंडर फॉर्म के साथ सभी सरकारी फॉर्म, मुहरें, नामपट्ट और पत्र शीर्ष आदि सभी अंग्रेजी में होते आए हैं।
स्वतंत्रता के बाद जिन लोगों के हाथ में सत्ता आई, उन अंग्रेजी पिट्ठुओं, हमारे नीति-निर्णायकों, अभिजात्य एवं पढ़े-लिखे वर्ग के लोगों ने अंग्रेजी को हर मुख्य विभाग की कार्यकारी भाषा बना दिया था।
हालांकि नरेन्द्र मोदी की सरकार आने के बाद कम से कम यह तो किया गया है कि अब हर जानकारी हिन्दी में दी जाती है और इंटरनेट पर अंग्रेजी के साथ सरकारी वेबसाइट्स और पोर्टल पर हिन्दी में भी जानकारी उपलब्ध है। यहां यह कहना उचित होगा कि यदि केंद्र और राज्य की सरकारें हिन्दी या अन्य भारतीय भाषाओं की उपेक्षा करती हैं तो वे भाषा की दुश्मन ही मानी जाएंगी।
करें विचार...
करें विचार...

