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हिन्दी भाषा के 10 दुश्मन, जानिए कौन...

अनिरुद्ध जोशी 'शतायु'|
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5. स्कूल और कॉलेज : अब 'पाठशाला' या 'विद्यालय' शब्द का इतना प्रचलन नहीं रहा। 'स्कूल' सबसे ज्यादा प्रचलित शब्द है। यह सब मैकाले की करतूत है। उसी ने सबसे पहले संस्कृत की सभी पाठशालाएं बंद करवाई थीं। कॉन्वेंट तो मैकाले के जमाने से है। उसने ही कहा था कि इस देश को तोड़ना है और ईसाई धर्म स्थापित करना है तो सबसे पहले यहां की भाषा को समाप्त करो। उसके ही कार्य को आज के लोग अच्छी तरह आगे बढ़ा रहे हैं। भारत के सरकारी और प्राइवेट स्कूलों पर एक शोध कर लीजिए, आपको हकीकत का पता लग जाएगा।
 
आज देश के सरकारी विद्यालयों की दशा देखकर दुख होता है। ग्रामीण क्षे‍त्र में शिक्षक से ज्यादा छात्र पढ़े- लिखे हैं। ठेके पर शिक्षक रखे गए हैं, उनमें से कुछ तो पीकर बैठे रहते हैं। कुछ तम्बाकू घिसते रहते हैं और कुछ तो कई-कई दिनों तक नदारद रहते हैं। बस तनख्वाह लेने के लिए ही नौकरी कर रहे हैं। शिक्षा का तो कोई ढांचा है ही नहीं। यहां बच्चों को शिक्षा देने से ज्यादा जरूरत तो शिक्षकों को शिक्षा देने की है। यदि ठीक-ठीक शिक्षा नहीं होगी तो भाषा और संस्कृति भी नहीं होगी।
 
6. बाजारवाद : शॉपिंग मॉल, तमाम दुकानों के होर्डिंग और लगभग सभी प्रॉडक्ट से हिन्दी को हटा दिया गया है। पाश्‍चात्य जैसा दिखने की होड़ के चलते अब अंग्रेजी में बड़े-बड़े होर्डिंग लगाए जाते हैं। त्योहारों के बाजार में भी हिन्दी को अब रोमन कर दिया गया है।
 
बहुराष्ट्रीय कंपनियों ने पहले खूब हिन्दी में विज्ञापन छपवाए या प्रसारित करवाए, क्योंकि तब लोग इतनी अंग्रेजी नहीं जानते थे जितनी कि आज। बहुराष्ट्रीय कंपनियों का मकसद इसके पीछे हिन्दी का प्रेम नहीं बल्कि आम आदमी तक अपने उत्पादों को पहुंचाना था, लेकिन आज हिन्दी में अधिकतर अंग्रेजी मिली हुई है इसीलिए अब कुछ विज्ञापन सीधे-सीधे अंग्रेजी में ही दिए जाते हैं।
 
अब आप जानते ही हैं कि बाजारवाद ने देश के 3 सबसे बड़े त्योहार बना दिए हैं- पहला ‍क्रिसमस, दूसरा वेलेंटाइन-डे और तीसरा न्यू ईयर। पिछले कुछ वर्षों में हिन्दी के बाजार को खत्म करने की जो साजिश रची गई, उससे कोई भी अनभिज्ञ नहीं है। देशी और विदेशी कंपनियों ने मिलकर हिन्दी को बाजार से हटाने का कार्य प्रारंभ कर दिया है इसीलिए आजकल अधिकतर साहित्यकार 'बाजारवाद' को गाली देते मिल जाएंगे।

अगले पन्ने पर जारी...
 
 
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