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हिन्दी भाषा के 10 दुश्मन, जानिए कौन...

अनिरुद्ध जोशी 'शतायु'|
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4. मोबाइल और इंटरनेट : दुनियाभर में कई भाषा बोलने वाले लोग रहते हैं लेकिन इन सबके लिए इंटरनेट पर इंग्लिश एक साझा भाषा है और ये एकदम अलग किस्म की भाषा के तौर पर उभर रही है। इस इंटरनेट की साझा भाषा के चलते हिन्दी ही नहीं, अन्य कई भाषाएं भी हिंग्लिश होती जा रही हैं। कुछ भाषा विज्ञानी मानते हैं कि आने वाले 10 सालों में अंग्रेजी भाषा इंटरनेट पर राज करेगी लेकिन वो अंग्रेजी भाषा आज की अंग्रेजी से जुदा होगी। हिंग्लिश यानी हिन्दी, पंजाबी, उर्दू और अंग्रेजी के मिश्रण से बनी भाषा, जो भारतीय ऑनलाइन उपभोक्ताओं के बीच काफी आम है।
 
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दरअसल, रोजमर्रा की जिंदगी में जिस तरह इंटरनेट का इस्तेमाल बढ़ रहा है वो मिश्रित भाषा के फलने-फूलने का जरिया बन गया है, लेकिन यह मिश्रित भाषा उस सेतु की तरह है जिस पर से चलकर संपूर्ण भारत अंग्रेज बन जाएगा। तब उसे यह पता ही नहीं चलेगा कि कब हमसे हमारी भाषा छूट गई।
 
इस हिंग्लिश के चलते इंटरनेट पर इसी भाषा में सामग्री (कंटेंट) बनाने का दबाव रहता है। उन्हें ज्यादा हिन्दी परोसने की मनाही रहती है। फिर क्या परोसें? हम जो परोसेंगे वही तो वे सीखेंगे, लेकिन ऐसा नहीं हुआ। अब जिन्हें अंग्रेजी नहीं आती या जो अंग्रेजी से कतराते हैं उनके बारे में कंपनियां ये प्रचार करने में लगी हैं कि अंग्रेजी नहीं आने का बहाना अब नहीं चलेगा। खैर...! 
 
हमने हिन्दी को एसएमएस के जरिए रोमन में ढाला जिसके चलते तथाकथित बुद्धिजीवी चेतन भगत कहने लगे कि हिन्दी को देवनागरी नहीं, रोमन में लिखा जाना चाहिए। शशि थरूर भी हिन्दी का विरोध कर चुके हैं। हालांकि ट्विटर और फेसबुक पर इस बयान के पहले से ही रोमन का प्रचलन रहा है।
 
इंटरनेट पर कभी हिन्दी में स्तरीय और स्थायी महत्व की सामग्री डालने का कम ही प्रयास हुआ है। इंटरनेट और वाट्सऐप को तो हिन्दी में भड़ास निकालने का माध्यम बनाकर छोड़ रखा है। इंटरनेट के प्रारंभिक युग में साहित्य की सोच रखने वाले ब्लॉगरों ने खूब क्लिष्ट और अशिष्ट हिन्दी को परोसा जिसके चलते हिन्दी के प्रति आने वाली युवा पीढ़ी कभी आकर्षित नहीं हो पाई, वह अंग्रेजी को ही महत्व देती रही। ये ब्लॉगर लिखते भी क्या हैं? खुद के अवसाद को भारतभर में प्रचारित कर सिर्फ असंतोष बढ़ाने का ही कार्य करते रहे हैं।

अगले पन्ने पर जारी...
 
 
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