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हिन्दी भाषा के 10 दुश्मन, जानिए कौन...

अनिरुद्ध जोशी 'शतायु'|
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7. अंग्रेजी के समर्थक : इस देश में बहुत से लोग ऐसे हैं, जो अंग्रेजी के समर्थक हैं। उन्होंने ही अंग्रेजी को प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से इस देश में बढ़ावा दिया। उन्हें कुछ लोग मैकाले या अंग्रेजों की संतान कहते हैं। लेकिन ऐसे कहने वाले लोग ही अपने बच्चों को अंग्रेजी माध्यम के स्कूल में पढ़ाना चाहते हैं और अंग्रेजी की ट्यूशन भी लगवाते हैं। ऐसा क्यों? क्योंकि अंग्रेजी को अब मजबूरी बना दिया गया है। उसके बगैर रोजगार नहीं मिलेगा, व्यक्ति की प्रगति बाधित हो जाएगी और उसमें हीनता का बोध होगा।
 
खासतौर पर बहुत ज्यादा पढ़े-लिखे, साहित्यकार, बुद्धिजीवी, इंजीनियर, वैज्ञानिक, शिक्षाविद, अभिनेता, पत्रकार, सरकारी एवं राजकीय कार्यकर्मी व उद्योगपति आदि सभी जब अपनी किसी सभा या समारोह में जब कहीं इकट्ठे होते हैं तो न मालूम क्यों उनके भीतर अंग्रेजी-प्रेम 'जाग्रत' हो जाता है। वे एक-दूसरे पर अंग्रेजी झाड़ते हुए नजर आते हैं। सचमुच अब अंग्रेजी हमारे हिन्दी जानने वाले भाइयों या गरीबों को नीचा साबित करने या दिखाने का माध्यम भी बन गई है। 
 
8. टेक्नोलॉजी आपके टेलीविजन, रिमोट, प्रेशर कुकर, फ्रिज, कंप्यूटर, बाइक, कार आदि सभी ऑटो और इलेक्ट्रॉनिक सामान पर क्या हिन्दी लिखी होती है। आप चीन में जाइए सभी सामान पर उनकी भाषा में लिखा होता है। पश्‍चिम ने तकनीक के अनुसार अपनी भाषा का विकास किया। भारत ने ऐसा करने में कोई खास रुचि नहीं दिखाई। अब जैसे मोबाइल और वीडियो को ही लें। इसे हिन्दी में क्या कहेंगे? ऐसे हजारों शब्द हैं, जो तकनीक के साथ जन्मे। हमारे यहां का भाषा विभाग, भाषा परिषद या भाषा एवं प्रौद्योगिकी संस्थान क्या करता है? संचार एवं सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय क्या करता है? जो लोग यह तावा करते हैं कि तकनीक के कारण हिन्दी का विकास हुआ है उनसे कहना चाहता हूं कि यह विकास एक छलावा है। हिन्दी के कंधे पर बैठकर अंग्रेजी का ही विकास होगा।
 
दूसरी बात, पश्‍चिम ने अपनी भाषा को तकनीक के अनुसार ढाला नहीं, भाषा के साथ छेड़छाड़ किए बगैर भाषा के अनुसार तकनीक को ढाला। भारत ने ऐसा नहीं किया, उसने भाषा को तकनीक के अनुसार ढाल लिया अर्थात तकनीक के सामने भाषा को झुकने पर मजबूर कर दिया जिसके चलते भाषा में बहुत-सा बदलाव हुआ। कभी चंद्रबिंदु हटाया तो कभी लगाया। अब तो कुछ अक्षर तकनीक के चलते हटा दिए गए, जैसे ङ, ञ् और हलंत वाले कुछ शब्द। 'श्रृ' लिखने में दिक्कत होती है तो 'श्र' लिखकर ही काम चला लेते हैं। अभी तक हिन्दी का कोई ढंग का टाइपराइटर या की-बोर्ड विकसित नहीं हुआ। अंग्रेजी के अनुसार चलता है हिन्दी का की-बोर्ड। अभी भी हजारों तरह के फोन्ट अभी भी प्रचलन में हैं।
 
तीसरी बात, चीन, कोरिया, जापान इत्यादि देशों में कम्प्यूटर तो आया लेकिन ऐसा कम्प्यूटर, जो कि अपनी भाषा में काम करने में सक्षम हो। इससे समस्त देशवासियों को समान रूप से लाभ पहुंचा। हमारे देश में जान-बूझकर उल्टी गंगा चलाई जाती है। यहां यदि आप कुछ नई चीज सीखना चाहें तो पहले आपको अंग्रेजी सीखने की आवश्यकता पड़ेगी। अंग्रेजी सीखो तभी तकनीक सीख पाओगे, सॉफ्टवेयर या हार्डवेयर इंजीनियर बन पाओगे। कितनी विडंबना है कि हमें हर नई चीज सीखने के लिए अंग्रेजी पर निर्भर रहना पड़ता है। अब तो अंग्रेजी ने हमारी मानसिकता भी बदल दी है।

अगले पन्ने पर जारी...
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