7. अंग्रेजी के समर्थक : इस देश में बहुत से लोग ऐसे हैं, जो अंग्रेजी के समर्थक हैं। उन्होंने ही अंग्रेजी को प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से इस देश में बढ़ावा दिया। उन्हें कुछ लोग मैकाले या अंग्रेजों की संतान कहते हैं। लेकिन ऐसे कहने वाले लोग ही अपने बच्चों को अंग्रेजी माध्यम के स्कूल में पढ़ाना चाहते हैं और अंग्रेजी की ट्यूशन भी लगवाते हैं। ऐसा क्यों? क्योंकि अंग्रेजी को अब मजबूरी बना दिया गया है। उसके बगैर रोजगार नहीं मिलेगा, व्यक्ति की प्रगति बाधित हो जाएगी और उसमें हीनता का बोध होगा।

8. टेक्नोलॉजी : आपके टेलीविजन, रिमोट, प्रेशर कुकर, फ्रिज, कंप्यूटर, बाइक, कार आदि सभी ऑटो और इलेक्ट्रॉनिक सामान पर क्या हिन्दी लिखी होती है। आप चीन में जाइए सभी सामान पर उनकी भाषा में लिखा होता है। पश्चिम ने तकनीक के अनुसार अपनी भाषा का विकास किया। भारत ने ऐसा करने में कोई खास रुचि नहीं दिखाई। अब जैसे मोबाइल और वीडियो को ही लें। इसे हिन्दी में क्या कहेंगे? ऐसे हजारों शब्द हैं, जो तकनीक के साथ जन्मे। हमारे यहां का भाषा विभाग, भाषा परिषद या भाषा एवं प्रौद्योगिकी संस्थान क्या करता है? संचार एवं सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय क्या करता है? जो लोग यह तावा करते हैं कि तकनीक के कारण हिन्दी का विकास हुआ है उनसे कहना चाहता हूं कि यह विकास एक छलावा है। हिन्दी के कंधे पर बैठकर अंग्रेजी का ही विकास होगा।

तीसरी बात, चीन, कोरिया, जापान इत्यादि देशों में कम्प्यूटर तो आया लेकिन ऐसा कम्प्यूटर, जो कि अपनी भाषा में काम करने में सक्षम हो। इससे समस्त देशवासियों को समान रूप से लाभ पहुंचा। हमारे देश में जान-बूझकर उल्टी गंगा चलाई जाती है। यहां यदि आप कुछ नई चीज सीखना चाहें तो पहले आपको अंग्रेजी सीखने की आवश्यकता पड़ेगी। अंग्रेजी सीखो तभी तकनीक सीख पाओगे, सॉफ्टवेयर या हार्डवेयर इंजीनियर बन पाओगे। कितनी विडंबना है कि हमें हर नई चीज सीखने के लिए अंग्रेजी पर निर्भर रहना पड़ता है। अब तो अंग्रेजी ने हमारी मानसिकता भी बदल दी है।
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