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बौद्ध राष्ट्रों में आतंकवाद के बढ़ते खतरे...

Last Updated: Saturday, 29 October 2016 (14:42 IST)
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: श्रीलंका, म्यांमार, कंबोडिया और थाईलैंड वैसे तो बौद्ध राष्ट्र हैं लेकिन यहां के मुस्लिम बहुल क्षे‍त्र में अब तनाव बढ़ने लगा है। श्रीलंका में कटनकुड़ी नगर मुस्लिम बहुल बन चुका है तो म्यांमार का अराकान प्रांत बांग्लादेश के रोहिंग्या मुस्लिमों से आबाद है। कंबोडिया, थाईलैंड में सबसे ज्यादा तनाव है। संसार का एक बहुत बड़ा भाग बौद्ध मतावलंबी है। जापान को छोड़कर (चीन, वियतनाम आदि देश कम्युनिस्ट है यद्यपि वहां भी बौद्ध मतावलंबी काफी संख्या में हैं) श्रीलंका, म्यांमार और थाईलैंड आदि सभी देशों में ये जिहादी आतंकवादी अब सक्रिय होने लगे हैं।
जहां मिली-जुली आबादी हो और मुसलमानों का बहुमत हो वहां अल्पसंख्यकों के प्रति उनका रवैया एक जैसा ही होता है। यानी पहले अपने उग्र रवैये से सामाजिक और मानसिक दबाव बनाना, फिर मार-काट और अंत में अल्पसंख्यकों को खदेड़कर शत-प्रतिशत इस्लामी क्षेत्र बना लेना। थाईलैंड में इसी के चलते वहां 3 दक्षिणी प्रांत- पट्टानी, याला और नरभीवाट- मुस्लिम बहुल (लगभग 80 प्रतिशत) हो चुके हैं।
 
इन 3 प्रांतों में अल्पसंख्यक बौद्धों की हत्याएं और भगवान की मूर्तियों को तोड़ना, सुरक्षा बलों से मुठभेड़, बौद्ध भिक्षुओं पर हमले, थाई सत्ता के प्रतीकों, स्कूलों, थानों, सरकारी संस्थानों पर हमले और तोड़फोड़, निहत्थे दुकानदारों और बाग मजदूरों की हत्या एक आम बात हो गई थी। ये लोग अपनी दुकानें और संपत्ति छोड़कर या कौड़ियों के मोल बेचकर बड़े शहरों की ओर भागने लगे। 
 
थाईलैंड के मुसलमानों ने थाई भाषा और जीवन प्रणाली को अंगीकार करने और थाई लोगों से घुल-मिलकर रहने की बजाय पड़ोसी मुस्लिम देश मलेशिया से अपनी निकटता बनाई और मलय भाषा को अपनाकर वे अपने को एक पृथक राष्ट्र के रूप में उजागर करने लगे। थाईलैंड में अल कायदावाद का मूल हथियार बनी है इंडोनेशिया आधारित 'जेमाह जमात इस्लामियाह', जिसके गुट अलग-अलग नामों से प्राय: सभी 'आसियान' देशों में फैले हुए हैं। इनका एक ही उद्देश्य है- गैर-मुस्लिमों का सफाया और गैर-मुस्लिम सत्ता से सशस्त्र संघर्ष। 
 
थाईलैंड में 2004 का वर्ष काफी उपद्रवग्रस्त रहा। बात 28 अप्रैल 2004 की है। पट्टानी प्रांत में उस दिन उन्मादभरे मुस्लिम जवानों ने सेना से संघर्ष किया। इस भिड़ंत में 100 उन्मादी तत्व और 10 सैनिक मारे गए और 16 को सैनिकों ने बंदी बना लिया। किंतु अभी संघर्ष चल ही रहा था कि बचे हुए 32 मुस्लिमों ने जाकर एक पुरानी मस्जिद में शरण ले ली और वहां से लड़ाई जारी रखी। जब 6 घंटे तक भी इन लोगों ने हथियार नहीं डाले तो सैनिक मस्जिद में घुस गए और सभी को गोली से उड़ा दिया। 
 
जब 2004 में करीब 10 महीनों तक मुस्लिम बहुल दक्षिण प्रांतों में उपद्रव नहीं रुके तो प्रधानमंत्री सहित देश के सभी वर्गों के 930 सदस्यों के शिष्टमंडल ने महारानी सिरीकित से भेंट की और इस पर विचार करने को कहा। तब से एक नीति के तहत संघर्ष जारी है और इस संघर्ष के बीच इस्लामिक आतंकवादियों द्वारा भी एक के बाद एक किए जाने वाले बम विस्फोट भी जारी है।
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