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गणतंत्र दिवस विशेष : आजादी के मायने ढूंढता गणतंत्र...

Author सुशील कुमार शर्मा|
भारत देश हर जगह, हर वर्ग एवं हर स्तर पर बदलाव की अनुभूति कर रहा है, लेकिन इस बदलाव की बयार के बीच यह बुनियादी सवाल उठाए जाने की जरूरत है कि हम जिस संप्रभु, समाजवादी जनवादी (लोकतांत्रिक) गणराज्य में जी रहे हैं, वह वास्तव में कितना संप्रभु है, कितना समाजवादी है और कितना जनवादी है?

पिछले 69 वर्षों के दौरान आम भारतीय नागरिक को कितने जनवादी अधिकार हासिल हुए हैं? हमारा संविधान आम जनता को किस हद तक नागरिक और जनवादी अधिकार देता है और किस हद तक, किन रूपों में उनकी हिफाजत की गारंटी देता है? संविधान में उल्लिखित मूलभूत अधिकार अमल में किस हद तक प्रभावी हैं? संविधान में उल्लिखित नीति-निर्देशक सिद्धांतों से राज्य क्या वास्तव में निर्देशित होता है? ये सभी प्रश्न एक विस्तृत चर्चा की मांग करते हैं।
 
विकास के पथ पर मैं इतना निराशावादी भी नहीं हूं कि ये कहूं कि स्वतंत्रता के 69 साल बाद भी हमने कोई प्रगति नहीं की है। भारत विश्‍व की सबसे पुरानी सभ्यताओं में से एक है जिसमें बहुरंगी विविधता और समृद्ध सांस्‍कृतिक विरासत है। इसके साथ ही यह अपने आपको बदलते समय के साथ ढालती भी आई है। 
 
आजादी पाने के बाद पिछले 69 वर्षों में भारत ने बहुआयामी सामाजिक और आर्थिक प्रगति की है। भारत कृषि में आत्‍मनिर्भर बन चुका है और अब दुनिया के सबसे औद्योगीकृत देशों की श्रेणी में भी इसकी गिनती की जाती है। इन 69 सालों में भारत ने विश्व समुदाय के बीच एक आत्मनिर्भर, सक्षम और स्वाभिमानी देश के रूप में अपनी जगह बनाई है। सभी समस्याओं के बावजूद अपने लोकतंत्र के कारण वह तीसरी दुनिया के अन्य देशों के लिए एक मिसाल बना रहा है। उसकी आर्थिक प्रगति और विकास दर भी अन्य विकासशील देशों के लिए प्रेरक तत्व बने हुए हैं।
 
बहुत कठिन है डगर पनघट की...
 
लेकिन इन सब प्रगति के सोपानों के बीच भारत का गण आज भी विकास के उस छोर पर खड़ा है, जहां से मूलभूत सुविधाओं की दरकार है। स्वतंत्रता हासिल करने पर जिन उच्च आदर्शों की स्थापना हमें इस देश व समाज में करनी चाहिए थी, हम आज ठीक उनकी विपरीत दिशा में जा रहे हैं और भ्रष्टाचार, दहेज, मानवीय घृणा, हिंसा, अश्लीलता और कामुकता जैसे कि हमारी राष्ट्रीय विशेषताएं बनती जा रही हैं।
 
समाज में ग्रामों से नगरों की ओर पलायन की तथा एकल परिवारों की स्थापना की प्रवृत्ति पनप रही है। इसके कारण संयुक्त परिवारों का विघटन प्रारंभ हुआ तथा उसके कारण सामाजिक मूल्यों को भीषण क्षति पहुंच रही है। दूसरे शब्दों में कहा जा सकता है कि संयुक्त परिवारों को तोड़कर हम सामाजिक अनुशासन से निरंतर उच्छृंखलता और उद्दंडता की ओर बढ़ते चले जा रहे हैं।
 
इन 69 वर्षों में हमने सामान्य लोकतंत्रीय आचरण भी नहीं सीखा है। भ्रष्टाचार में लगातार वृद्धि होती गई है और इस समय वह पूरी तरह से बेकाबू हो चुका है। भ्रष्टाचार सरकार के उच्चतम स्तर से लेकर निम्नतम स्तर तक व्याप्त है। समाज का भी कोई क्षेत्र इससे अछूता नहीं बच सका है। देश में सत्ता के शीर्ष पर बैठे भ्रष्टाचारियों के काले कारनामे, सार्वजनिक धन का शर्मनाक हद तक दुरुपयोग, सार्वजनिक भवनों व अन्य संपत्तियों को बपौती मानकर निर्लज्जतापूर्ण उपभोग कर रहे हैं। आखिर ये सब किस प्रकार का आदर्श हमारे समक्ष उपस्थित कर रहे हैं? आजादी के 69 साल बाद भी भारत अनेक ऐसी समस्याओं से जूझ रहा है जिनसे वह औपनिवेशिक शासन से छुटकारा मिलने के समय जूझ रहा था। 
 
हमारी अस्मिता हमारी मातृभाषा होती है। अगर हम अपनी मातृभाषा को छोड़कर अंग्रेजी या अन्य विदेशी भाषा को प्रमुखता देंगे तो निश्चित ही हम राष्ट्रीयता की मूल भावना से भटक रहे हैं। इस देश के गण से भी कई सवाल हैं। 100 रुपए में अपना मत बेचने वाले गण क्या तंत्र से सवाल पूछ सकते हैं? पड़ोसी के घर चोरी होती देख छुपकर सोने वाला गण क्या स्वतंत्रता पाने का अधिकारी है? भ्रूण में बेटी की हत्या करने वाला गण किस मुंह से तंत्र से सवाल पूछेगा? अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का हिमायती गण आतंकियों की फांसी पर सवाल खड़े करेगा तो उसे ये भी भुगतना होगा। प्रश्न बहुत हैं और उत्तर देने वाला कोई नहीं।
 
सुलगते सवालों के बीच यह स्वतंत्र गणतंत्र। गण से अलग खड़ा तंत्र और तंत्र से त्रासित गण एक-दूसरे के पूरक होकर भी अपूर्ण है। हमें समझना होगा कि राष्ट्रवाद की भावना 'वसुधैव कुटुम्बकम्' की भावना से आरंभ होकर आत्म-बलिदान पर समाप्त होती है।
 
एक प्रार्थना (where the mind is without fear), जो कविवर रवीन्द्र नाथ टैगोर ने की थी, हम सभी को करनी चाहिए। 
 
जहां मष्तिस्क भय से मुक्त हो। 
जहां हम गर्व से माथा ऊंचा कर चल सकें। 
जहां ज्ञान बंधनों से मुक्त हो। 
जहां हर वाक्य हृदय की गहराइयों से निकलता हो। 
जहां विचारों की सरिता तुच्छ आचारों की मरुभूमि में न खोती हो। 
जहां पुरुषार्थ टुकड़ों में न बंटा हो
जहां सभी कर्म भावनाएं एवं अनुभूतियां हमारे वश में हों। 
हे परमपिता! उस स्वातंत्र्य स्वर्ग में इस सोते हुए भारत को जाग्रत करो। 

 
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