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सिंहस्थ 2016 - क्या खोया क्या पाया

Author सुशील कुमार शर्मा|
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सिंहस्थ की उपलब्धियों को लेकर चौहान का जनता की अदालत में जाना तय है तो विकास की आड़ में भ्रष्टाचार का भी एक मुद्दा बनना तय है। शिवराज की साख से जुड़ गए इस आयोजन ने मुख्यमंत्री को किस हद तक मजबूत किया और उनकी लोकप्रियता विशुद्ध राजनीति के मोर्चे पर भविष्य में क्या गुल खिलाएगी, ये तो कालांतर में समय के गर्भ में छुपा एक रहस्य है। 
 
लेकिन आध्यात्मिक वैभव के साथ संपन्न हुए सिंहस्थ 2016 ने एक ऐसी लकीर खींच दी है जिसे मिटाना तो दूर, छोटा साबित करना भी किसी दूसरे मुख्यमंत्री के लिए आसान नहीं होगा। चाहे फिर वो सभी अखाड़ों से जुड़े साधु-संतों को शिप्रा के तट पर एकसाथ स्नान कराना हो या फिर सार्वजनिक मंचों पर उनकी मौजूदगी सुनिश्चित कर एकजुटता का संदेश दिलवाना हो…। यही नहीं, समन्वय, सामंजस्य के साथ दूरदर्शिता का लोहा मनवाकर सिंहस्थ को भव्य स्वरूप देना ही नहीं, बल्कि परंपराओं की बेड़ियों से कुछ कदम ही सही बाहर निकालकर वैचारिक धरातल पर एक नई बहस छेड़ना ही क्यों न हो।
 
अंतिम शाही स्नान का वो नजारा देखने लायक था, जब पहली बार शैव और वैष्णव अखाड़ों ने एकसाथ पवित्र शिप्रा नदी में पावन डुबकी लगाई। मुद्दा धर्म, आस्था, परंपरा से जुड़ा है लेकिन इसका मूल्यांकन जब भी किया जाएगा तो सियासत के पहलुओं को नजरअंदाज करना किसी के लिए आसान नहीं होगा। 
 
सिंहस्थ का आगाज भले ही भीड़ के मापदंड और अपेक्षाओं के अनुरूप नहीं हुआ था लेकिन समापन ने जो सुर्खियां बटोरीं वो उसकी सफलता को बयां कर गया। मोक्षदायिनी शिप्रा के सभी तटों पर अंतिम शाही स्नान में डुबकी के लिए उमड़े जनसैलाब से जो तस्वीर उभरकर सामने आई उसने अभी तक के सभी रिकॉर्ड ध्वस्त कर दिए। 
 
सामाजिक संगठनों ने सिंहस्थ के दौरान घाटों पर लगभग 300 चेंजिंग रूम, 1500 प्याऊ, 5000 डस्टबिन, 65 हजार केरी बैग, 5000 स्वयंसेवक, 160 एलईडी स्क्रीन, 500 पेपर बैग, 10 हजार स्वच्छता पर केंद्रित साइन बोर्ड, 600 नक्शे, 25 हजार वर्गफीट पर वॉल पेंटिंग, 100 स्वागत द्वार, 2500 लाइफ जैकेट, 651 सहायता केंद्र, 459 खोया-पाया केंद्र, 200 आसमानी गुब्बारे, 1000 मोबाइल चार्जिंग प्वॉइंट, 5 लाख थैले (दुकानदारों के लिए) और शासकीय सेवकों के लिए 20 हजार जैकेट की व्यवस्था की। 
 
ये आंकड़े बताते हैं ‍कि सिंहस्थ सिर्फ सरकारी व्यवस्थाओं के बल पर संपन्न नहीं हुआ बल्कि समाज के सभी वर्गों ने इस महाआयोजन में सहयोग दिया है। उज्जैन में सिंहस्थ के लिए करीब 30,000 से ज्यादा का ‪पुलिस बल‬ और ‪BSF बल‬ बाहर से आया है। अपने घर से दूर यहां ये लोग करीब 2 महीने से ज्यादा से कार्य कर रहे हैं। वह भी 18-20 घंटे रोज। न खुद की चिंता न खाने की फिक्र। बस उद्देश्य यही कि यहां आए किसी भी श्रद्धालु को ‪कोई परेशानी न हो‬।
 
प्रधानमंत्री इस आयोजन से अभिभूत थे। उन्होंने अपने भाषण में कहा- 'सिंहस्थ कुंभ इतने बड़े देश को एकरूपता में समेटने का प्रयास करता है। यह भारत की हजारों साल पुरानी संस्कृति को दिखाता है। परंपराएं पूरे प्राण के साथ कायम रहनी चाहिए। कर्म ही हमारा योग है। कर्म करने वाला नर ही नारायण बनता है। कुंभ का मेला वैसे 12 साल में एक बार होता है, कहीं-कहीं 3 साल में होता है। कुंभ की परंपरा कैसे प्रारंभ हुई होगी इस बारे में अलग-अलग मत प्रचलित हैं लेकिन इतना निश्चित है कि ये परंपरा मानव जीवन की सांस्कृतिक यात्रा की पुरातन व्यवस्था में से एक है।'
 
51 सूत्री सार्वभौम संदेश जारी कर सिंहस्थ की विचार परंपरा को पुनर्जीवित करने का मकसद साफ कर आयोजनकर्ता की कमान संभालकर शिवराज ने जिस तरह पर्दे के पीछे संघ को साधा और सार्वजनिक तौर पर पीएम मोदी को इसकी तारीफ करने को विवश किया वो गौर करने लायक है, जो उनकी बौद्धिक क्षमता ही नहीं समाज के उत्थान के प्रति संजीदगी को रेखांकित करने के साथ जवाबदेही का भी अहसास करा गया। ‘अतिथि देवो भव:’ की परंपरा को निभाते हुए बतौर सीएम शिवराज ने जिस तरह साधु-संतों से लेकर अध्यात्म गुरु और कथावाचकों के साथ सियासतदारों का भरोसा जीता, उसे भी नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।
 
अधिकांश भारतीय पर्वों में लोकरंजन ही नहीं, लोककल्याण का भाव भी निहित होता है और इस कुंभ के संबंध में भी श्रद्धालुओं का यही मत है कि कुंभ के स्नान से मानव के दोष तो मिटते ही हैं, संसार की विपत्तियों का भी नाश होता है। धर्म के नाम पर जातीय राजनीति भी होने लगी। धार्मिक आयोजनों में संविधान के विरुद्ध राजनीति प्रवेश कर गई। नेता और संत एक जैसे हो गए। दोनों के बीच अंतर घट रहा है। दोनों ही लेने वाले हो गए, देना भूल गए। संवेदनाएं पलायन करने लगीं। व्यापार रह गया। संत भी सौदा करने लगे। साधु-साध्वियों का मीडिया रिकॉर्ड प्रमाण है।
 
लोकतंत्र एवं संप्रदायों के उत्तरदायित्व का बोध लुप्त हो रहा है। देश में लाखों संत होने के बाद भी कहीं धर्म दिखाई नहीं दे रहा। क्या संतों की सार्थकता इस ह्रास में ही है। आज जो संप्रदाय में बड़े संत करें, वही धर्म हो गया। कुंभ के बाद सभी संत अपने-अपने टोले के साथ आशीर्वाद में हाथ उठाकर चले जाएंगे। मेजबान समाज-प्रदेश ने क्या खोया-क्या पाया, यह तो चर्चा में भी नहीं आएगा। 
 
कुंभ में भी यदि कुछ असहनीय होता है तो वह है संतों का व्यवहार। शाही स्नान के लिए तलवारें-बर्छे चलना यानी युद्ध का-सा दृश्य। क्या यह साधुत्व है? रियासतकाल में सुरक्षाकर्मी अखाड़ों से जुड़े थे। वे ही आज साधु हो गए। हथियार नहीं छुटे।
 
महाकुंभ जैसे धार्मिक समागमों के अवसर पर जहां जातिगत भेदभाव की परवाह किए बिना हजारों वर्षों से भक्तजन डु़बकी लगाते आ रहे हैं, जिस साधु समाज में सैकड़ों दलित माता-पिता से पैदा हुए लोग साधु बनकर उच्च पदों पर आसीन हैं, कथावाचक व गद्दीनशीन बने हुए हैं यहां तक कि मुस्लिम परिवार में पैदा हुए कई लोग हिन्दू धर्मोपदेशक, संत व प्रवचनकर्ता के रूप में अपना विशिष्ट स्थान बनाए हुए हैं। ऐसे महाकुंभ को जातिगत बनाना क्या राजनीति की मजबूरी है?
 
में भिन्नता और जोश का जबरदस्त प्रदर्शन है। ये राजनीतिक उपदेश और व्यापार का महत्वपूर्ण स्थान है, लेकिन कुंभ मेले में करोड़ों लोगों के आने का मुख्य कारण है विश्वास, जिसके कारण वो इसकी ओर खिंचे चले आते हैं। 
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