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हिन्दी कविता : उजड़ी बस्ती

ujri basti poetry
-कुसुम शर्मा
 
बात बिगड़ी, फिर से बना ली जाएगी,
उजड़ी बस्ती, फिर से बसा ली जाएगी।
 
शहर में कोई भी, न हो मायूसों ख्वार, 
जो सहर होगी, रात काली जाएगी।
 
यूं ही जाते-जाते, आज वो कहते गए, 
हां तेरी हसरत, भी निकाली जाएगी।
 
उस बेवफा को, बावफा कह देंगे हम, 
पर आबरू सबकी बचा ली जाएगी।
 
हैं गर राहों में, कोरा पतझड़ छाया,
हौसलों से बहारें बिछा ली जाएंगी।

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