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प्रवासी कविता: फ़रिश्ते

Pravasi poetry
ज़िंदगी में कई इंसान ऐसे मिल जाते हैं 
जो इंसा ही नहीं फरिश्तों सा फ़र्ज़ निभाते हैं 
 
बहुत कठिन होता है आंखों के आंसू को आंखों में समाकर 
..मैं ठीक हूं ये कहना पर ये तो 
दर्द को अपने पन्नों पर उड़ेल जातें है 
तब पढ़ने वालों के अश्क छलक जाते हैं 
 
ना देखा होता है कभी उन्हें पहचान सिर्फ़ शब्दों की होती है 
पर उनके शब्द ही तो दिलों को छू जाते हैं 
 
दर्द सहते रहते ख़ुद फिर भी दूजों को राह बताते हैं 
ख़ुश होते ग़ैरों की ख़ुशी देखकर ना कभी भी द्वेषभाव मन में लाते हैं 
 
उनके ख़्वाब टूट गए होते हैं जीवन में ऐसे 
की जैसे दरख़्तों की शाख़ से पत्ते टूटकर बिखर जाते हैं 
 
जो वचन दे दें किसी को वो, कभी नहीं मूकर पाते हैं 
ये ऐसे इंसा होते हैं जो दुनिया से जाने के बाद भी याद रह जाते हैं 
 
टिकी है दुनिया ऐसे फ़रिश्तों की जांबाज़ी पर वरना इस स्वार्थ से भरी दुनिया में लोग कैसे ख़ुद को सम्भाल पाते हैं 
 
सोचती हूं काश हर इंसा का पागलपन भी ऐसा ही होता एकदूजों के लिए जीने का मजा ही कुछ और होता 
 
स्वर्ग से सुंदर तब तो शायद ये जहां होता चलो ना, दोस्तों कुछ अंश ही सही अपना लें आदत इनकी और आ जाएं काम किसी के हम भी 
 
ज़ख्मों को सहला के दुखियारों के कुछ दूवाए पा जाए और कुछ अच्छा कर जाएं। 

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