Published: Tue, 10 Mar 2026 (10:40 IST)
Updated: Tue, 10 Mar 2026 (10:49 IST)
- पंकज सिंह
दुनिया का तमाशा चलता रहता है,
मनोरंजन इसका कभी ना रुकता है।
लाख जतन बादल करता है,
मेला भरने से ना रुकता है।
झूम उठती हर क्यारी है,
गाने लगती बस्ती न्यारी है।
छत पर जब थाली बजती है,
किलकारी घर में गूंजती है।
बचपन कहां गुम हो जाता है,
रवि सिर पर चढ़ आता है।
किरणों से जीवन तप जाता है,
देख बुढ़ापा प्राणी रोने लगता है।
पानी का बुलबुला फूट जाता है,
बहता हवा-सा थम जाता है।
खिलाड़ी समझ दांव लगाता है,
दर्शक बन रह जाता है।
जोड़-तोड़ खूब करता है,
गांठ की पूंजी गंवा देता है।
सूरज जाता है, चांद आता है,
चांद ना हो तो तारा होता है।
सितारा बन आसमां में उभरता है,
तकदीर का बादशाह बन जाता है।
वक्त बड़ा बेरहम होता है,
भोर का तारा भी छुप जाता है।
पीढ़ियां यहां कितनी दफन है,
दूसरे के कंधे पर पहले का तन है।
मैं भी आया मुझे भी जाना है,
ना रोक पाएगा जमाना है।
आने वाला जी भरकर रोता है,
जाने वाला चैन की नींद सोता है।
बहुत चल लिया अब सुस्ताना है,
चला-चली का खेल पुराना है।