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काव्य-संसार
father's memories
Written By
श्रवण गर्ग
Last Updated :
Thursday, 4 August 2022 (17:13 IST)
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स्मृतियां भी मैं, जंगल भी मेरे ही भीतर!
BY:
वेबदुनिया न्यूज डेस्क
Published:
Tue, 10 Mar 2026 (10:40 IST)
Updated:
Tue, 10 Mar 2026 (10:49 IST)
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नहीं टूटता कुछ भी एक बार में
न अखरोट, न नारियल,
न पहाड़ या दिल पिता का!
दरकती है सबसे पहले
कोई कमजोर चट्टान
देती है संकेत ढहने का
पूरा का पूरा पहाड़!
हवा का एक तेज झोंका
या आकाश से टूटता पानी
बहा ले जाता है चट्टान अपने साथ
छूट जाती हैं अंगुलियां जैसे
भीड़ में हाथों से पिता के!
नहीं दिखते बहते हुए आंसू
टूटता है जब कोई कोना मन का
निकल जाते हैं तभी पिता बाहर
कहकर टहलने का
दूर, बहुत दूर कहीं-
स्मृतियों के घने जंगल में!
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