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खुलासा, सोने के कारोबार में खप रहा है काला धन

demonetisation
नई दिल्ली। एक टीवी चैनल के खुलासे में दावा किया गया है कि लोग अभी भी अपना काला धन और बिना हिसाब-किताब का धन सोने जैसे सुरक्षित कारोबार में कर रहे हैं। काले धन को खपाने में सोने के कारोबार जैसे सुरक्षित ठिकाने न केवल मदद कर रहा है वरन इसे बढ़ा भी रहा है। 
 
टीवी चैनल मिरर नाऊ की एक संवाददाता ऐश्वर्या पालीवाल ने दिल्ली के गोल मार्केट में बीस लाख रुपए नकद लेकर उससे सोना खरीदने की कोशिश की। नोटबंदी और विमुद्रीकरण के दौर में उम्मीद की जाती है कि उन्हें या तो कहीं और जाने का कहा जाएगा या फिर कहा जाएगा कि वे लेन-देन का प्रमाण मांगें और दें।  
 
लेकिन ऐसा कुछ नहीं हुआ वरन जो कुछ हुआ वह सरकार की नीतियों और नीयत पर सवाल खड़े करता है। संवाददाता और सोना कारोबारी के बीच कुछ इस तरह बातचीत हुई।
 
'हां, यह पूरी तरह से शुद्ध है। सारे जेवरात आप जो देख रही हैं, उनमें हालमार्क लगा है। 22 कैरेट की  शुद्धता की मुहर लगी है। अब आप बिल चाहती हैं या नहीं, यह तो आप पर निर्भर करता है', यह कहना था एक दुकानदार का। एक दूसरा बोला, 'कुछ नहीं, पैन कार्ड वगैरह, आपको कुछ भी दिखाने की जरूरत नहीं है।'
 
एक दूसरे जूलरी स्टोर के मालिक ने उन्हें आश्वस्त किया, 'आपको बिल नहीं मिलेगा और आपका नाम  भी कहीं शामिल नहीं किया जाएगा।' 
 
देश के सबसे बड़े और व्यस्त रहने वाले सोना बाजारों के जेवरात व्यापारी खुलेआम कैश में लेन-देन करने के लिए तैयार हैं। इतना ही नहीं, इस संवाददाता से कहा गया कि बीसलाख को बहुत थोड़ी सी  राशि है।
 
सभी दुकानों पर संवाददाता ने पाया कि जेवरात कारोबारी केवल एक शर्त पर कैश लेने के लिए तैयार थे कि हम बिल की कोई मांग नहीं करेंगे। यह सब राजधानी दिल्ली के गोल मार्केट की दुकानों में हो रहा है। 
 
रीयल एस्टेट हमेशा ही भ्रष्टचार का बड़ा स्रोत रहा है और इस बात को सभी भलीभांति जानते हैं। मात्र एक निर्माण करने के लिए आपको विभिन्न स्तरों पर विभिन्न स्वीकृतियों की स्थानीय म्युनिसिपल संस्थाओं से जरूरत होती है। यह स्वीकृतियां लेने के ‍लिए स्थानीय निकायों में पैसे देने पड़ते हैं।
 
इसी गंदगी को साफ करने के लिए सरकार ने पिछली वर्ष 8 नवंबर को एक कड़ा कदम उठाया था लेकिन क्या सरकार की विमुद्रीकरण की घोषणा इस समस्या को समाप्त करने में सहायक सिद्ध हुई है।   
 
एक चैनल ने मैजिकब्रिक्स कंपनी की पड़ताल की थी और इस सिलसिले में बहुत सारे भवन निर्माताओं से बात की थी तो उनका कहना था कि इस उपाय से भ्रष्टाचारियों का हौसला और भी बढ़ गया है। वे अब रिश्वत भी सोने या नई करंसी में मांगने लगे हैं। 
 
सरकारी अधिकारी और नौकरशाह पूरी ढिठाई के साथ रिश्वत मांगने लगे हैं। विदित हो कि ज्यादातर रीयल एस्टेट डेवलपर्स इन लोगों की जवाबी कार्रवाई के डर से कैमरे पर कुछ भी कहने से डरते हैं। उन्हें डर होता है कि उनको अगले भवन की स्वीकृति मिल पाएगी या नहीं। लेकिन उन्होंने उनकी पहचान न उजागर करने पर अपने अनुभवों को साझा किया।
 
यह समस्या केवल मुंबई तक सीमित नहीं है। देश भर के दर्जनों डेवलपर्स ने माना कि नौकरशाही के प्रत्येक स्तर पर भ्रष्टाचार है। इससे भी बड़ी बात है कि नगरीय निकायों और विकास संस्थाओं में स्वयं ही कहते हैं कि स्वीकृतियों में तेजी लाने के लिए पैसा चाहिए और प्रत्येक काम के लिए एक राशि तय है।
 
बिल्डर्स और डेवलपर्स का दावा है कि प्रत्येक स्वीकृति प्रोजेक्ट के आकार पर निर्भर करती है और इसमें अधिकारियों को फाइले निपटाने के लिए भुगतान करना होता है। इस कारण से यह कहना है कि विमुद्रीकरण से भवन निर्माण क्षेत्र में होने वाला भ्रष्टाचार कम हो गया है या समाप्त हो गया है, सरासर झूठ बोलना होगा। स्वाभाविक है कि इससे भवनों की कीमत में बढ़ोत्तरी होती है।