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मांगलिक दोष : सटीक ज्योतिषीय विश्लेषण

Author पं. हेमन्त रिछारिया|
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जन्मपत्रिका में ऐसी अनेक स्थितियां है जो के प्रभाव को कम करने अथवा उसका परिहार करने में सक्षम हैं। इनमें से कुछ योगों के बारे में हम यहां उल्लेख कर रहे हैं।
 
1. यदि किसी वर-कन्या की जन्मपत्रिका में लग्न,चर्तुथ,सप्तम,अष्टम और द्वादश स्थान में अन्य कोई पाप ग्रह जैसे शनि,राहु,केतु आदि स्थित हों तो का परिहार हो जाता है।
 
2. यदि मंगल पर गुरु की पूर्ण दृष्टि हो तो मंगलदोष निष्प्रभावी होता है।
 
3. यदि लग्न में मंगल अपनी स्वराशि मेष में अथवा चर्तुथ भाव में अपनी स्वराशि वृश्चिक में अथवा मकरस्थ होकर सप्तम भाव में स्थित हो तब भी मंगलदोष निष्प्रभावी हो जाता है।
 
4. यदि मंगल अष्टम भाव में अपनी नीचरशि में कर्क में स्थित हो अथवा धनु राशि स्थित मंगल द्वादश भाव में हो तब मंगल दोष निष्प्रभावी हो जाता है।
 
5. यदि मंगल अपनी मित्र राशि जैसे सिंह,कर्क,धनु,मीन आदि में स्थित हो तो मंगलदोष निष्प्रभावी हो जाता है।
 
6. यदि वर-कन्या की की चंद्र अथवा गुरु से युति हो तो मंगलदोष मान्य नहीं होता है। 
 
7. वर-कन्या की जन्मपत्रिका में लग्न से, चंद्र से एवं शुक्र से जिस मांगलिक दोष कारक भाव अर्थात्‌ लग्न, चर्तुथ, सप्तम, अष्टम व द्वादश जिस भाव में मंगल स्थित हो दूसरे की जन्मपत्रिका में भी उसी भाव मंगल के स्थित होने अथवा उस भाव में कोई प्रबल पाप ग्रह जैसे शनि, राह-केतु के स्थित होने से ही मान्य होता है। यदि वर-कन्या दोनों के अलग-अलग भावों मंगल अथवा मांगलिक दोष कारक पाप ग्रह स्थित हों तो इस स्थिति में मंगलदोष का परिहार मान्य नहीं होता है। अतः किसी विद्वान दैवज्ञ से गहनता से जन्मपत्रिका परीक्षण करवाकर ही मांगलिक दोष का निर्णय एवं परिहार मान्य करें।
 
-ज्योतिर्विद् पं. हेमन्त रिछारिया
संपर्क: astropoint_hbd@yahoo.com 
 
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