कश्यप ऋषि : ऐसा माना जाता है कि कश्मीर का नाम कश्यप ऋषि के नाम पर पड़ा था। कश्मीर के मूल निवासी सारे हिन्दू थे। कश्मीरी पंडितों की संस्कृति लगभग 6000 साल पुरानी है और वे ही कश्मीर के मूल निवासी हैं। इसलिए अगर कोई कहता है कि भारत ने कश्मीर पर कब्जा कर लिया है तो यह बिलकुल गलत है।

कश्यप को ऋषि-मुनियों में श्रेष्ठ माना गया हैं। पुराणों अनुसार हम सभी उन्हीं की संतानें हैं। सुर-असुरों के मूल पुरुष ऋषि कश्यप का आश्रम मेरू पर्वत के शिखर पर था, जहाँ वे परब्रह्म परमात्मा के ध्यान में लीन रहते थे। समस्त देव, दानव एवं मानव ऋषि कश्यप की आज्ञा का पालन करते थे। कश्यप ने बहुत से स्मृति-ग्रंथों की रचना की थी।
भिन्न भिन्न स्रोत्रों से पता चलता है कि कैस्पिरियन सागर का नाम भी ऋषि कश्यप के नाम पर है। दरअसल, एक बार समस्त धरती पर विजय प्राप्त करके भगवान परशुराम ने महर्षि कश्यप को धरती का यह भू भाग दान में दे दिया था। तब कश्यप द्वीप के नाम से उन्होंने मध्य एशिया में अपना एक उपनिवेश स्थापित किया (महाभारत, भीष्म पर्व, 6.11)। हिस्ट्री ऑफ पर्सिया, खण्ड-1, पृष्ठ-28 के अनुसार कश्यप सागर (वर्तमान कैस्पियन सी) उनकी (द्वीप की) सीमा के भीतर था। महर्षि कश्यप ने कश्यप सागर के किनारे अनेक विकास कार्य समपन्न किए।
महर्षि कश्यप के द्वारा ही कश्मीर बसाया गया था। हिमालय के उत्तरी-पश्चिमी कोने पर सर्वाधिक ऊंचाई वाली पहाड़ी का जो कोण बनता है उसकी एक भुजा कराकुर्रम पर्वत और दूसरी भुजा हिन्दुकुश पर्वत है। कराकुर्रम पर्वत महर्षि कश्यप के ही अधिकार में था। अफगानिस्तान की ओर से आने वाली और कुर्रम दर्रे से होकर बत्रू जिले में होती हुई सिन्धु नदी में मिल जाने वाली सुप्रसिद्ध कुर्रम नदी महर्षि कश्यप की ही अधिकारिक सीमा में थी। कश्यप पर्वत, जिसे आजकल काकेशश पर्वत कहा जाता है, की चोटी पर महर्षि काश्यप कठिन साधनाएं और तपस्या किया करते थे। इस चोटी को कश्यपतुंग के नाम से भी जाना जाता है। आज भी उनके नाम पर विख्यात कश्यप सागर (कैस्पियन सी), क्रुमु नदी, कुर्रम पर्वत और कूर्माचंल प्रदेश आदि उनकी यशस्वी कीर्तिकथा का उदघोष करते हैं।

