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पिशाचमुक्तेश्वर महादेव पितरों को देते हैं प्रेत योनि से मुक्ति

Author कु. सीता शर्मा|
ज्योतिष विज्ञान की दृष्टि से उज्जयिनी का अपना विशिष्ट स्थान है। श्राद्ध पक्ष में में स्थापित शिवलिंग श्री का खास महत्व है।


 

श्राद्ध पक्ष के इन सोलह दिनों में में से 68वें नंबर पर आने वाले श्री पिशाचमुक्तेश्वर महादेव पर शुद्ध गाय के दूध, मिश्रित तिल, जौ, गंगाजल, शिप्रा आदि से अभिषेक करने से पितृ तृप्त और प्रसन्न होते हैं। पूर्वज चाहे किसी भी योनि में प्रवेश कर गए हो, चाहे वे अकाल मृत्यु को प्राप्त हुए हो पिशाचमुक्तेश्वर महादेव उन्हें प्रेत योनि से मुक्त करते हैं। 
 
श्री पिशाचमुक्तेश्वर महादेव की कथा : 
 
कलियुग में सोम नाम का शुद्र हुआ मरने पर वह मरूदेश में पिशाच हुआ। एक समय उसे मार्ग से एक हर विद्या का जानकार ब्राह्मण मिला। उसे देखकर पिशाच खाने के लिए दौड़ा। ब्राह्मण की गाड़ी के पहिये की घड़घड़ाहट सुन वह पिशाच घबरा गया तब ब्राह्मण ने कहा तुम्हें डरने की जरूरत नहीं है। पिशाच ने यह जानकर कि ब्राह्मण विद्वान और ज्ञाता है उससे पूछा कि पिशाच योनि किस कर्म करने से मिलती है और कौन से पुण्य से मुक्ति होती है। 
 
तब ब्राह्मण ने बताया द्रव्य हरण करने और देवता के द्रव्य को चुराने वाला पिशाच्य योनी को प्राप्त होता है। ब्राह्मण के कटु वचनों को सुनकर पिशाच ने मुक्ति का मार्ग पूछा। तब ब्राहम्ण ने कहा तीर्थ नगरी अवंतिका में पिशाचत्व को नाश करने वाले महादेव हैं श्री पिशाचमुक्तेश्वर महादेव उसके दर्शन से तुम्हें पिशाच योनि से छुटकारा मिलेगा।

तब वह पिशाच महाकाल वन में आया उसने शिप्रा में स्नान किया और उस लिंग के दर्शन किए तब उसे पिशाच योनि से मुक्ति मिली व विष्णुलोक प्राप्त हुआ। जो व्यक्ति पितृपक्ष में श्री पिशाचमुक्तेश्वर लिंग के दर्शन व अभिषेक करते हैं इनके पितरों का मोक्ष होता है। उन्हें प्रेत या पिशाच योनि से मुक्ति मिलती है। 
 
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