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प्रवासी कविता : कवयित्री की जिंदगी की किताब के कुछ पन्ने

pravasi kavita
जिंदगी की अधूरी किताब से चुराए कुछ पन्ने एक कवयित्री ने 
और छुपाकर रख दिया उन्हें मन के किसी कोने में 
जब होती है अकेली बतिया लेती है उन पन्नों से  
और कुछ बोझ जीवन का हल्का कर लेती है 
 
यादें दे जाती है कभी होठों पर मुस्कान, तो कभी 
भर देती हैं आंखों में सुनहरे सपने और कभी नमीं 
 
काश! यह सारे जुड़ कर बना पाते उस किताब को संपूर्ण       
और जीवन की यादों के वो पन्ने सार्थक हो जाते
 
कवयित्री ने सोचा लिख दूं एक कविता इसी क्षण 
उंडेल दूं सारे जज़्बात जो उमड़ रहे मन के आंगन में
 
बन जाऊं पंखुड़ी सी हल्की और उड़ने लगूं तितली सी  
और डूब जाऊं भावनाओं के असीम सागर में 
सोच-सोच बन गई कवयित्री फिर भी लगे है, 
अभी जब ना लिख पाऊं दिल के इन एहसासों को
तब मानो प्रपंचों के भार से कहीं ना मैं दब जाऊं
ये सोचते ही मुरझा जाती है मन के फूलों की बगिया 
और हर क्यारी में उग आते हैं कांटे ही कांटे। 
 
कुछ लब्ज़ लबों पर अब आए हैं, जो तोड़ दर्द का बंधन कुछ बताए जाए है ऐसे में दिल एक सवाल कर जाए है 
हर रिश्ते के रंग को अपनाने वाली यह कवयित्री  
रिश्तों की मर्यादा निभाती, साथ देती और प्यार बांटती सबको 
पर सच में क्या वो भी बदले में उतना ही प्यार और सम्मान पाए है? 
 
सोचती हूं कितना कोमल मन होता होगा कवयित्री का 
जो पशु-पक्षी, पेड़-पौधों पर मन में सुंदर, सरस दृष्टि रख उस पर भी कविता लिख जाए है 
समझती है पत्थर के जज़्बात जिसमें प्राण नहीं बसते 
पर पत्थर की मूर्ति में भाव देख कर प्यारीसी कविता उस पर भी लिख जाए है 
 
ऐसे जज़्बातों के सैलाब जब-जब आते हैं मन में, तब बड़ी द्रवित होकर कलम उठाए है,
कहलाती तब एक कवयित्री जब भावनाओं के समंदर में गोता लगाए है। 

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