webdunia

बारिश पर प्रवासी कविता : पाहुन...

Author लावण्या शाह|
Widgets Magazine

 
 
बरखा-स हृदया
 
उमड़-घुमड़कर बरसे,
तृप्त हुई, हरी-भरी, शुष्क धरा।
 
बागों में खिले कंवल-दल,
कलियों ने ली मीठी अंगड़ाई।
फैला बादल दल, गगन पर मस्ताना
सूखी धरती भीगकर मुस्काई।
 
मटमैले पैरों से हल जोत रहा,
कृषक थका गाता पर उमंग भरा।
'मेघा बरसे, मोरा जियरा तरसे,
आंगन देवा, घी का दीप जला जा।'
 
रुनझुन-रुनझुन बैलों की जोड़ी,
जिनके संग-संग सावन गरजे।
पवन चलाए बाण, बिजुरिया चमके,
सत्य हुआ है स्वप्न धरा का आज,
पाहुन बन हर घर बरखा जल बरसे।
 
Read more on : वर्षा पावस ऋतु बैलों की जोड़ी काली रात आपकी कलम साहित्य साधना विदेशी रचना आधुनिक प्रवासी साहित्य प्रवासियों की कविताएं Rain Poems Poems For Rain Rainy Day Poem Poem On Rainy Season Poems For Rainy Day

( ! ) Warning: Unknown: Write failed: No space left on device (28) in Unknown on line 0

( ! ) Warning: Unknown: Failed to write session data (files). Please verify that the current setting of session.save_path is correct (/var/lib/php/sessions) in Unknown on line 0