webdunia

प्रवासी कविता : अनजानी राहें...

पुष्पा परजिया|
Widgets Magazine

 
 
 
एक अनजान पर चल पड़े मुसाफिर,
चलना था, बस चलना ही था इस राह पर।
 
आगे क्या होने वाला है, ये पता नहीं था,
अपने सब हैं, साथ खुशी थी इसकी काफी।
 
अपनों से दूर हुआ तो सहसा कांप उठा,
मन की धरती से आहों का संताप उठा।
 
किसे सुनाएगा ए पथिक बता,
तेरी आंखों में तो भरे हैं अपनों के सपने।
 
तेरे इस पथ पर आते ही उनके सपने पूर्ण हुए,
पर मूक अनकहे तेरे अपने अरमां तो चूर्ण हुए।
 
किसे पता सोने के पिंजरे में पंछी की आहों का, 
दिखता है तो एक मुखौटा झूठ-मूठ की चाहों का।
 
मन में दबी उदासी बाहर से नजर नहीं आती,
छुपे हुए आंसू और आहें भी नजर नहीं आतीं।
 
अरमां सबके पूर्ण हुए, है इसका संतोष मगर,
दूर तलक तुझको अपनी मंजिल नजर नहीं आती।
Read more on : राह रास्ता अनजानी राहें आपकी कलम हिन्दी में प्रवासी साहित्य एनआरआई कविताएं साहित्य साधना विदेशी रचना आधुनिक प्रवासी साहित्य प्रवासियों की कविताएं Poetry सुख-दु:ख Anjani Rahen Anjani Rahein Pravasi Hindi Poetry Nri Poems In Hindi

( ! ) Warning: Unknown: Write failed: No space left on device (28) in Unknown on line 0

( ! ) Warning: Unknown: Failed to write session data (files). Please verify that the current setting of session.save_path is correct (/var/lib/php/sessions) in Unknown on line 0