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विदेशों में हिन्दू धर्म के खिलाफ सुनियोजित साजिश

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लगभग सारी दुनिया में हिन्दू धर्म, हिन्दू संस्कृति, हिन्दू समाज अभूतपूर्व संकटों और अंतरराष्ट्रीय षड्यंत्रों के दौर से गुजर रहा है। इस षड्यंत्र में अमेरिका की कई संस्थाएं शामिल हैं, किन्तु दलित फ्रीडम नेटवर्क और दो ऐसी संस्थाएं हैं, जो अमेरिकी शासन में भी इतनी गहरी पैठ रखती हैं कि उसकी भारत-विषयक वैदेशिक नीतियों को भी ये तदनुसार प्रभावित किया करती हैं।
 
दलित फ्रीडम नेटवर्क (डीएफएन) का मुख्यालय संयुक्त राज्य अमेरिका के कोलोराडो शहर में स्थित है। इसके निदेशकों में से कई अमेरिकी कांग्रेस के पूर्व या वर्तमान सदस्य-सीनेटर हैं, तो कई प्रमुख प्रशासक व शिक्षाविद। भारतीय दलितों की मुक्ति का अगुवा होने का दावा करने वाली यह संस्था ‘दलित-मुक्ति’ के नाम पर का दानवीकरण करने में कमर कस कर लगी हुई है। 
 
इस संस्था का एकमात्र एजेंडा है कि हिन्दू देवी-देवताओं, पर्व-त्योहारों, ग्रंथों-शास्त्रों, रीति-रिवाजों सबको विकृत रूप में विश्लेषित-प्रचारित कर दिया जाए। हिन्दू धर्म का छिद्रान्वेषण करने और दलितों को गैर-दलित हिन्दुओं के विरुद्ध सशस्त्र गृहयुद्ध के लिए भड़काते रहना डीएफएन की प्राथमिकता है। इस कारण से यह संस्था विभिन्न शिक्षाविदों, लेखकों से तत्संबंधी उत्पीड़न साहित्य लिखवाकर उन्हें प्रायोजित-प्रोत्साहित व पुरस्कृत करती है, तो विभिन्न स्वयंसेवी संस्थाओं (एनजीओ) से सुनियोजित सर्वेक्षण कराकर उन्हें वैश्विक मंचों पर उछालती है और अमेरिकी सरकार के विभिन्न आयोगों व नीति-निर्धारक निकायों के समक्ष भाड़े के भारतीय बौद्धिक-बहादुरों द्वारा हिन्दू धर्म की तथाकथित असहिष्णुता से दलितों के पीड़ित-प्रताड़ित होने तथा उस पीड़ा-प्रताड़ना से उबरने के लिए ‘ईसा’ को पुकारने की गवाहियां दिलवाती है।
 
डीएफएन की इस पैंतरेबाजी से अमेरिकी सरकार की विदेश-नीतियां प्रभावित होती रही हैं। मालूम हो कि सन 2005 में वैश्विक मानवाधिकार पर गठित संयुक्त राज्य अमेरिका के एक सरकारी आयोग ने डीएफएन द्वारा 'वर्ण-व्यवस्था के शिकार 20 करोड़ लोगों के लिए समता व न्याय' शीर्षक से प्रेषित प्रतिवेदन के आधार पर यह घोषित कर दिया था कि भारत में हिन्दुओं द्वारा धर्मांतरित दलितों एवं ईसाई मिशनरियों को हिंसा का शिकार बनाया जा रहा है, जिन्हें सजा भी नहीं दी जाती।  
 
डीएफएन ने कांचा इलाइया नामक एक तमिल भारतीय से ‘व्हाई आई एम नॉट हिन्दू’ (‘मैं हिन्दू क्यों नहीं हूं’) नामक पुस्तक लिखवाकर,  उसे पोस्ट डॉक्टोरल फेलोशिप प्रदान की गई थी। जॉन दयाल, कुमार स्वामी व स्मिता नुरुला नामक भारतीय ईसाइयों से सन 2007 में अमेरिकी ‘कांग्रेसनल ह्यूमन राइट्स कॉकस’ के समक्ष इस झूठे तथ्य की गवाहियां दिलवाई हैं कि हिन्दू धर्म अतिवादी है और उसकी अतिवादिता ही सभी प्रकार की धार्मिक हिंसा के लिए जिम्मेवार है।
 
‘क्रिश्चियन टुडे’ पत्रिका के अनुसार डीएफएन के द्वारा कांचा से अमेरिकी कांग्रेस की एक सभा में यह तथाकथित साक्ष्य भी दिलवाया गया है कि हिन्दू धर्म एक प्रकार का 'आध्यात्मिक फासीवाद' है। दलित फ्रीडम नेटवर्क के पैसे पर पल रहे कांचा ने एक और किताब लिखी है- ‘पोस्ट हिन्दू इंडिया’, इसमें उसने दलितों को हिन्दू-देवी-देवताओं के शस्त्र-धारण का प्रायोजित अर्थ (दलित-विरोधी) समझाते हुए गैर-दलित हिन्दुओं के विरुद्ध सशस्त्र युद्ध के लिए प्रेरित किया है। 
 
डीएफएन की पहल पर कांचा इलाइया की ये दोनों पुस्तकें विभिन्न अमेरिकी विश्वविद्यालयों में हिन्दू धर्म-विषयक पाठ्यक्रम में शामिल कर ली गई हैं। यह डीएफएन क्रिश्चियन सॉलिडरिटी वर्ल्ड वाइड तथा गॉस्पेल फॉर एशिया और एशियन स्टडीज सेंटर नामक संस्थाओं के साथ गठजोड़ कर ऑल इंडिया क्रिश्चियन काउंसिल के माध्यम से भारत में दलितों को गैर-दलित हिन्दुओं के विरुद्ध भड़काने और उनके धर्मांतरण का औचित्य सिद्ध करने के बाबत पश्चिमी देशों में हिन्दू धर्म के विरुद्ध घृणा फैलाने हेतु भिन्न-भिन्न परियोजनाओं को क्रियान्वित करते रहता है।
 
हिन्दू धर्म का दानवीकरण तथा हिन्दू-समाज के विखंडन में अमेरिका की एक और संस्था काफी सक्रिय है- ‘सेन्टर फॉर रिलीजियस फ्रीडम’, जो भारत में पश्चिमी रुझान के तथाकथित बुद्धिजीवियों, खासकर दलितों को धार्मिक स्वतंत्रता का छ्द्म अर्थ समझाता है कि पुराने धर्म अर्थात हिंदू धर्म को आत्मसात किए रहना बंधन है और इससे विलग हो जाना स्वतंत्रता है, जबकि ईसाइयत को अपनाना तो सीधे मुक्ति ही है। धर्म-अध्यात्म के ककहरा-मात्रा की भी समझ नहीं रखने वाले लोग दुनिया के आध्यात्मिक गुरु के वंशजों को धार्मिकता-आध्यात्मिकता सिखा रहे हैं, तो इससे बड़ी विडम्बना और क्या हो सकती है!
 
लेकिन ‘फ्रीडम हाउस’ और इससे जुड़ी संस्थाएं धार्मिक स्वतंत्रता की अपनी इसी अवधारणा पर भारतीय कानूनों की समीक्षा करती हैं और तदनुकूल कानून बनवाने के लिए भारत सरकार पर दबाव कायम करती हैं। इसके लिए ये संस्थाएं तरह-तरह के मुद्दों को पैदा करती हैं और तत्संबंधी तरह-तरह के आंदोलन प्रायोजित करती-कराती हैं। फ्रीडम हाउस ने कुछ वर्षों पहले ‘हिन्दू एक्सट्रीमिज्म’ अर्थात ‘हिन्दू उग्रवाद’ नाम से बेसिर-पैर का एक मुद्दा खड़ा किया था और इस तथाकथित कपोल-कल्पित प्रायोजित-सुनियोजित मुद्दे को मीडिया के माध्यम से दुनिया भर में प्रचारित करते हुए इस पर बहस-विमर्श के बहुविध कार्यक्रमों का आयोजन कर 'द राइजिंग ऑफ हिन्दू एक्सट्रीमिज्म' (हिन्दू उग्रवाद का उदय) नाम से एक रिपोर्ट प्रकाशित की थी। उक्त रिपोर्ट में हिन्दू-उग्रवाद का बेसुरा, बेतुका राग अलापते हुए ‘फ्रीडम हाउस’ ने जो रिपोर्ट प्रकाशित की थी, उसके कुछ अंशों पर ही गौर करने से आप इसकी नीति-नीयत और इसके निहित उद्देश्यों को समझ सकते हैं।
 
'द राइजिंग ऑफ हिन्दू एक्सट्रीमिज्म” नामक उक्त रिपोर्ट में ‘रिलीजियस फ्रीडम’ की वकालत करने वाली इस संस्था ने जिन बातों पर जोर दिया है, वह तो वास्तव में हिन्दुओं के धर्मांतरण में मिशनरियों के समक्ष खड़ी बाधाओं पर उसकी चिंता की ही अभिव्यक्ति है। रिपोर्ट में धार्मिक स्वतंत्रता संबंधी भारतीय कानूनों की गलत व्याख्या करते हुए भारत को ‘एक धार्मिक उत्पीड़क देश’ घोषित कर इसके विरुद्ध यहां अमेरिका के हस्तक्षेप की आवश्यकता पर बल दिया गया है। मालूम हो कि हमारे देश के ‘धार्मिक स्वतंत्रता अधिनियम’ और तत्संबंधी अन्य कानून धोखाधड़ी से अथवा बहला-फुसलाकर या जबरिया किए जाने वाले धर्मांतरण को रोकते हैं, न कि स्वेच्छा से किए जा रहे धर्मांतरण को। किन्तु उस रिपोर्ट में इसकी व्याख्या इन शब्दों में की गई है- 'भारतीय कानून के तहत किसी धर्म अथवा पंथ विशेष के आध्यात्मिक लाभ पर बल देना गिरफ्तारी का कारण हो सकता है। भारत में धर्मांतरण आधारित टकराव इस कारण है, क्योंकि ईसाइयत के माध्यम से दलितों की मुक्ति से अगड़ी जाति के हिन्दू घबराते हैं'। जाहिर है, इस व्याख्या में ‘आध्यात्मिक लाभ’ और ‘मुक्ति’ शब्द का गलत इस्तेमाल किया गया है, जिससे फ्रीडम हाउस और उसकी सहयोगी संस्थाओं की मंशा और मान्यता दोनों स्पष्ट हो जाती है।
 
गॉस्पल फॉर एशिया (जीएफए) अमेरिका की एक ऐसी भारी-भरकम संस्था है जो भारत के बाहर-भीतर सर्वत्र यह प्रचारित करती रहती है कि एशिया में भूख और गरीबी के लिए हिन्दू धर्म जिम्मेदार हैं, क्योंकि कई एशियाई देशों पर इसका प्रभाव है। भारत की खाद्य समस्या के लिए हिन्दू धर्म पर दोषारोपण करते हुए इसके कर्ताधर्ता केपी योहन्नान कहते हैं कि हिन्दुओं के आध्यात्मिक अंधेपन के कारण पूजनीय बनी गायों और चुहियों से प्रतिवर्ष हजारों टन अनाज के नुकसान होने से खाद्यान-संकट गहराता जाता है। 
 
जीएफए का अपना है जहां से वह 92 भारतीय भाषाओं में हिन्दू धर्म के विरुद्ध अनर्गल प्रलाप करते रहता है और लोगों को ‘मुक्ति का मार्ग’ बताता है। यह मूर्तिपूजा की भर्त्सना करते हुए ईसा को सच्चा ईश्वर और हिन्दू-देवी-देवताओं को ‘दैत्य-पापी’ बताता है।  
 
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