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Triple Talaq Bill : तीन तलाक़ अमानवीय और असंवैधानिक था

Triple Talaq Bill
-करुणा प्रजापति
 
सबला को अबला मत समझो, हर नारी चिंगारी है।
सीता, गौरी, रमा, शारदा, शबनम, इंदिरा गांधी नारी है।
अंतराल भी भुला न पाए, गौरव की गाथाओं को।
जब-जब नारी से टकराई, तब-तब दुनिया हारी है।
 
सर्वप्रथम सभी बहनों को ट्रिपल तलाक़ बिल पास होने की हार्दिक बधाई। सुप्रीम कोर्ट को भी धन्यवाद जिसने मुस्लिम महिलाओं को भी इंसान समझा। यह जीत इसलिए भी ऐतिहासिक है, क्योंकि समाज की आधी आबादी अब तक अपने धर्म के नाम पर मूक पशु की भांति अत्याचार सहते जा रही थी, जो अत्यंत अमानवीय और संविधान के विरुद्ध था।
 
एक महिला को सिर्फ इसलिए तलाक़ दे दिया जाता था, क्योंकि वो मुस्लिम महिला है और उसकी कोई औकात नहीं। बेचारी अपने ससुराल में हमेशा इसी डर से सहमी रहती कि कहीं सब्जी में नमक ज्यादा न पड़ जाए। कहीं रोटी का साइज कम-ज्यादा न हो जाए या शौहर के परिवार की गुलामी करने में कोई कसर न रह जाए। बिचारी शौहर की गालियां व लात-घूंसे सिर्फ इसीलिए सहती थी कि कहीं ये मुझे नाराज होकर तलाक़ न दे दे। 
 
हर समय उसके ऊपर तलाक़ की तलवार लटकती रहती थी, मानो वो कोई वस्तु हो जिसको जब जी में आया इस्तेमाल कर लिया और जब मन भर गया उठाकर फेंक दिया, क्योंकि दूसरी लाना भी आसान है। दूसरी से मन भरा तो तीसरी आ जाएगी, कौन रोकने वाला है? इनके नबी का क़ानून जो चलता है। पर्सनल लॉ बोर्ड के आगे तो सुप्रीम कोर्ट भी कुछ नहीं कर पा रहा था।
 
लेकिन कहते हैं न कि पाप का घड़ा कभी न कभी फूटता ही है। कुछ ऐसा ही हुआ। न्याय के लिए भटकती हमारी 1400 मुस्लिम बहनों ने एक सर्वे करवाया जिसमें 90% महिलाओं ने कहा कि तीन तलाक़ अमानवीय और असंवैधानिक है।
 
सुप्रीम कोर्ट ने भी विभिन्न धर्मों के जज की पैनल द्वारा सुनवाई की और नतीजा सबके सामने है। आखिर मुस्लिम महिलाओं को 1400 साल पुराने मुस्लिम क़ानून का पालन करने से मुक्ति मिल ही गई। लेकिन मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड इसका खुलकर विरोध कर रहा है कि यह हमारा धार्मिक मामला है और इसमें कोई हस्तक्षेप न करे। लेकिन ये संविधान की धारा 14, 21 व 26 का सरासर उल्लंघन करता है।
 
अत: सिर्फ तीन बार तलाक़ बोल देने से तलाक़ नहीं होगा और शादी रद्द नहीं होगी और तलाक़ के लिए जो संवैधानिक नियम हैं, वे ही फॉलो करने होंगे। इसका पालन न करने पर तीन साल की सजा का भी प्रावधान है। 
 
इतना होने पर भी इसके लागू करने में कुछ व्यावहारिक दिक्कतें हैं जिन पर अमल करना बहुत जरूरी है, मसलन तीन तलाक़ पर 3 साल की सजा जबकि सामने वाले ने कोई अपराध नहीं किया जबकि हमारे देश में और बहुत से अपराधों के लिए 1 या 2 वर्ष की सजा का प्रावधान है।
 
और अगर उनके बच्चे हैं तो उसके भरण-पोषण की जिम्मेदारी भी शौहर को दी गई है। लेकिन अगर शौहर जेल में बंद रहेगा तो बच्चों का पेट कैसे भरेगा? दूसरा, क़ानून तो बन गया है लेकिन कट्टरपंथी विचारधारा वाले क्या इसे अपनाएंगे? ऐसे बहुत से प्रश्न हैं जिनके जवाब अभी आना बाकी है लेकिन इन सबके बीच अच्छी खबर ये है कि-
 
मंजिल मिले न मिले इसका गम नहीं, मंजिल की जुस्तजू में मेरा कारवां तो है/ 
उम्मीद की एक नई किरण दिखाई दी है, जागो सवेरा होने को है। 

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