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अंतरराष्ट्रीय चाय दिवस : चाय के साथ चटपटी चर्चा

चाय
चाय कहें या चाह... दोनों दूसरे की बहनें ही समझ लो। जब चाह होती है, तब चाय होती है और जब किसी से चाहत होती है तो साथ बैठकर चाय पी जाती है...। फिर चाहे वो चाहत किसी भी सजीव या निर्जीव वस्तु से हो...। जब चाहत किसी इंसान से हो तो उसके साथ वक्त बिताने के लिए साथ बैठकर चाय पी जाती है, जब किसी जगह से प्यार हो तो वहां बैठकर वक्त गुजारने के लिए चाय पी जाती है और जब किसी विषय से प्यार हो तो उसकी चर्चा करते हुए चाय की चुस्कियां लगाई जाती हैं... जिसे कहते हैं चाय पर चर्चा...। 
 
चुनावी मौसम में तो चाय को सम्मान देता ये तरीका सबसे ज्यादा प्रचलित है, जब हर चाय की गुमटी पर राजनीति के सुलगते मुद्दों पर गर्मागर्म चाय की चुस्कियां लगाई जाती है...। चर्चा जितनी रोचक होगी, चाय का स्वाद उतना ही मजेदार...। जैसे चाय किसी सिगड़ी पर नहीं इन्हीं हॉट इश्यूज़ पर उबल रही हो और सियासी गलियारों की खबरें चाय में मसाले की तरह काम करती हों...। 
 
खैर सियासत में इस चाय की जितनी पूछ परख है, घर परिवार की देहरी के अंदर भी उतना ही मान-सम्मान...। फिर भी तारीफ करनी पड़ेगी इस चाय की, कि इतनी पूछ-परख होते हुए भी जरा सा एटीट्यूड नहीं साहब...। वरना हम इंसानों को ही देख लो, जरा किसी ने चढ़ा दिया, तो फूल के कुप्पा हो जाते हैं...। 
 
पर घर के बाहर की चाय और अंदर की चाय में उतना ही अंतर होता है, जो घर के बाहर और अंदर की लाज-शर्म और मान मर्यादा में...। जैसे, बाहर की चाय में उबाल कुछ ज्यादा ही होता है, या यूं कहें कि दिनभर चूल्हे पर चढ़ी उबलती है...। अब न उबले तो पूछे भी कौन भला...5 रूपए भी नसीब न हों। लेकिन सच कहें तो लोगों को यही पसंद आती है साहब...। 
 
दूसरी घर की चाय, जरुरत के मुताबिक एक बार उबल की प्यालों में छन कर रह जाती है बस...। मान, मर्यादा और इज्जत का ख्याल करते हुए यूं बार-बार उबलना इसका स्वभाव नहीं, और तो और कीमत भी बहुत होती है इसकी...। क्योंकि घर की चाय जो ठहरी, एक बार मिल गई सो मिल गई, बार-बार नहीं मिलेगी...। फिर गई शाम के 4 बजे पर बात...। 
 
अब बात करें चाय की वैरायटी की, तो सैकड़ों तो वैरायटी आ चुकी है, लेकिन हम वही पसंद करते हैं अपनी पुरानी वाली अदरक चाय...। नई से ज्यादा सरोकार नहीं रख पाते... और अभी तो हाल ही में आई तंदूरी चाय ने भी बाजार में एंट्री मारी है...। गर्मागर्म कुल्हड़ वाली तंदूरी चाय...। और जब से आई है भाई साब, छाई हुई हैं मैडम...। छाए भी क्यूं ना भला...इसमें मिट्टी की खुशबू जो है, और तंदूर का स्वाद भी...। सोने पर सुहागे वाली है बात है बिल्कुल...।