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व्यंग्य : पुरस्कार का मापदंड

Author आरिफा एविस|
किसी भी श्रेष्ठ व्यक्ति के कर्मों का फल है। बिना पुरस्कार के किसी भी व्यक्ति को श्रेष्ठ नहीं माना जाना चाहिए। बिना पुरस्कार व्यक्ति का जीवन भी कुछ जीवन है? जैसे “बिन पानी सब सून।” इसलिए कम से कम जीवन में एक पुरस्कार तो बनता है जनाब। चाहे वह राष्ट्रीय, प्रदेशीय, धार्मिक, जातीय या कम से कम गली-मुहल्ले में बंटने वाले पुरस्कार ही क्यों न हो।



चाहे जीवन में कोई काम किया हो या न किया हो, लेकिन सम्मान प्राप्त करने के लिए जी-तोड़ और जोड़-तोड़ करना पुरस्कार प्राप्त करने के लिए आसान काम नहीं है।
 
पुरस्कार तो पहले भी मिलते आए हैं और आगे भी मिलते रहेंगे।  देखो भाई, जो समाज के लिए विभिन्न क्षेत्रों में श्रेष्ठ कार्य करें, जिनका नाम हो, दाम हो, काम हो, भाई बिना बात हर पुरस्कार पर अपनी नाक भोंह सिकोड़ते रहना कोई अच्छी बात नहीं है। 
 
हमे गर्व होना चाहिए कि हर बार की तरह इस बार भी उनको सम्मान मिला, जिन्होंने भारतीय संस्कृति की प्राचीनता को इतिहास से बाहर लाकर व्यापार सुलभ बना दिया। जिन्होंने सरकारी न्याय को उचित ठहराने के लिए सरकार का हर समय साथ देकर अपनी देश भक्ति का परिचय दिया। जिन्होंने देश की तरक्की के लिए बैंकों में जनता का जमा पैसा सरकार से लेकर निजी हित में सुरक्षित रख लिया ताकि जब भी देने की बारी आए मौका मिलते ही विदेश जाने से न चूकें।
   
तुम्हें क्या लगता है, पुरस्कार तुम्हारे गांवों के किसानों को मिलेगा, जो रात-दिन अपना खून पसीना बहाकर देश को अनाज, फल और सब्जियां मुहैया कराते हैं? जो खुद भूखे पेट रहकर देश की भूख मिटाते हैं और जब कर्ज न जुटा पाएं तो आत्महत्या कर लेते हैं।
 
या फिर पुरस्कार उन मजदूरों को मिलना चाहिए जो 14-16 घंटे अपने परिवार का जीवन चलाने के लिए कंपनी के मुनाफे लिए खपे रहते हैं। जो जानवरों की तरह अपना जीवन व्यतीत करने के लिए मजबूर हैं और जो सिर्फ सड़क, भवन, कपड़ा बनाने में ही अपना जीवन बिता देते हैं।
  
या फिर उन महिलाओं को पुरस्कार मिलना चाहिए जो बिना किसी वेतन के दिन रात खटकर देश की अर्थव्यवस्था को चलाने के लिए अवैतनिक रूप से काम करती हैं? क्या उन महिलाओं को मिलना चाहिए, जो अपने हक-हकूक के लिए बलात्कार का शिकार होती हैं, या उनको जो सामंती सोच के खिलाफ आवाज उठाने पर एसिड का शिकार होती होती हैं, या उस महिला को मिलना चाहिए जो पछले १५ वर्षों से भूख हड़ताल पर बैठी है जिसकी सिर्फ एक ही मांग है कि राज्य से अंग्रेजों द्वारा बनाया सही कानून हटाया जाए?
 
पुरस्कार क्या उन नौजवानों को मिलना चाहिए जो बेहतर जीवन के लिए अंधी प्रतियोगिता में झोंख दिया जाते हैं और अंत में अपनी योग्यता से कम पर गुजरा करते हैं? जिनकी ऊर्जा का इस्तेमाल धार्मिक उन्माद के लिए किया जाता है।  
क्या उन बाल श्रमिकों को मिलना चाहिए जो ढाबों, दुकानों और फैक्ट्रियों में अपना बचपन गवां कर जवान होने से पहले ही बूढ़े हो जाते हैं?
क्या उन आदिवासी लोगों को मिलना चाहिए जो देश भक्त बहुराष्ट्रिय कम्पनियों का विरोध जल, जंगल और जमीन के नाम पर करते हैं? जो दशकों से देशद्रोह के मामले में जेल की हवा खा रहे हैं। 
 
 भई पुरस्कार तो उन्हें ही मिलना चाहिए जो श्रेष्ठ हो, धनवान हो यानि की हर तरह से सक्षम हो। जो पुरस्कार प्राप्त करने की क्षमता रखता हो, जो सम्मान को संभाल कर रख सके ताकि पुरस्कार से सरकारी या गैर-सरकारी फायदा उठाया जा सके, न कि उनको मिले जो पुरस्कार की राशि को भी सिर्फ अपने जीवन को बचाने में लगा दे और समय आने पर पुरस्कार को वापस भी नहीं लौटा सके।
 
पुरस्कार की अपनी महत्ता होती है। यह सि‍र्फ उन्हीं भारतीय नागरिकों को जीवन के विभिन्न क्षेत्रों जैसे - कि समाज-सेवा, कला, खेल, चिकित्सा, विज्ञान, साहित्य, शिक्षा और सार्वजनिक जीवन आदि में विशिष्ट योगदान को मान्यता प्रदान करने के लिए दिया जाता है। किसानों, मजदूरों, महिलाओं और आदिवासियों ने कोई बड़ा काम तो किया नहीं, इसलिए इस परंपरा को तब तक बनाए रखना पड़ेगा जब तक कि कोई नई व्यवस्था न आ जाए। तब तक इस सम्मान को एक-दम सही सरकारी काम और देशभक्ति के उत्सव के रूप मनाया जाए 
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