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आषाढ़ अष्टाह्निका विधान क्या है, क्यों मनाया जाता है जैन धर्म में यह पर्व

जैन धर्म का अष्टाह्निका विधान पर्व 03 जुलाई से, 10 को होगा समापन

Ashtahnika festival Jain religion
What is Ashtahnika in Jainism: आषाढ़ अष्टाह्निका विधान क्या है: अष्टाह्निका पर्व जैन धर्म के सबसे महत्वपूर्ण और प्राचीन पर्वों में से एक है। 'अष्टाह्निका' शब्द का अर्थ है 'आठ दिनों का'। यह पर्व वर्ष में तीन बार मनाया जाता है- कार्तिक, फाल्गुन और आषाढ़ मास के शुक्ल पक्ष में अष्टमी तिथि से शुरू होकर पूर्णिमा तक चलता है। इस दौरान आठ दिनों तक विशेष धार्मिक अनुष्ठान, पूजा-पाठ, ध्यान और तपस्या की जाती है।ALSO READ: जैन धर्म में फाल्गुन अष्टान्हिका विधान क्या होता है?
 
2025 में आषाढ़ अष्टाह्निका विधान 3 जुलाई, गुरुवार को शुरू होकर 10 जुलाई, गुरुवार को संपन्न होगा यानी अष्टमी से पूर्णिमा तक यह पर्व जारी रहेगा।
 
इस पर्व का मुख्य केंद्र नंदीश्वर द्वीप है। जैन मान्यताओं के अनुसार, इस दौरान स्वर्ग से देवता आकर नंदीश्वर द्वीप में स्थित 52 जिनमंदिरों में निरंतर आठ दिनों तक धर्म कार्य जैसे पूजन, अभिषेक, स्तुति करते हैं। जो भक्त नंदीश्वर द्वीप तक नहीं पहुंच सकते, वे अपने निकट के जैन मंदिरों में इसी भाव से पूजा-अर्चना और अनुष्ठान करते हैं।
 
क्यों मनाया जाता है जैन धर्म में यह पर्व: आषाढ़ अष्टाह्निका विधान मनाने के पीछे कई महत्वपूर्ण कारण और मान्यताएं हैं:
 
1. आत्म-शुद्धि और मोक्ष की प्राप्ति: यह पर्व मुख्य रूप से आत्मा की शुद्धि और मोक्ष की प्राप्ति के उद्देश्य से मनाया जाता है। इन आठ दिनों में जैन मतावलंबी अपने मन, वचन और कर्म को शुद्ध करने का प्रयास करते हैं, बुरी आदतों और विचारों से मुक्ति पाने की कोशिश करते हैं।
 
2. तीर्थंकरों और सिद्धों की आराधना: इस पर्व के दौरान भगवान महावीर स्वामी सहित सभी तीर्थंकरों और अनंत सिद्ध परमेष्ठी की विशेष आराधना की जाती है। सिद्धचक्र मंडल विधान और नंदीश्वर विधान जैसे अनुष्ठान आयोजित किए जाते हैं, जिनमें असीम अर्घ चढ़ाए जाते हैं।
 
3. नंदीश्वर द्वीप की भक्ति: नंदीश्वर द्वीप जैन ब्रह्मांड विज्ञान में वर्णित एक शाश्वत तीर्थ स्थान है, जहां कोई मनुष्य नहीं जा सकता। अष्टाह्निका पर्व के दौरान, यह माना जाता है कि देवता वहां धर्म आराधना करते हैं और जैन श्रद्धालु अपने मंदिरों में रहकर उसी भक्ति भाव को प्राप्त करने का प्रयास करते हैं।
 
4. कर्मों का क्षय: ऐसी मान्यता है कि इन आठ दिनों में की गई पूजा, भक्ति और तपस्या का फल सामान्य दिनों में की गई छह महीने की पूजा से भी अधिक मिलता है। यह कठिन तप और व्रत कर्मों के बंधन को शिथिल करने और उनका क्षय करने में सहायक होते हैं।
 
5. रोगों से मुक्ति (मैना सुंदरी की कथा): एक प्रचलित कथा के अनुसार, मैना सुंदरी ने अपने पति श्रीपाल के कुष्ठ रोग के निवारण के लिए आठ दिनों तक सिद्धचक्र विधान मंडल की साधना की थी। इस साधना के प्रभाव से श्रीपाल सहित 700 कुष्ठ रोगियों को भी रोग से मुक्ति मिली थी। पद्मपुराण में भी इस पर्व के अनुसरण से कुष्ठ रोग से मुक्ति का वर्णन मिलता है, जिससे इसकी चिकित्सकीय और आध्यात्मिक शक्ति में विश्वास बढ़ता है।
 
6. अहिंसा और करुणा का पालन: यह पर्व जैन धर्म के मूल सिद्धांतों जैसे अहिंसा, सत्य, अस्तेय/ चोरी न करना, ब्रह्मचर्य और अपरिग्रह अर्थात् आवश्यकता से अधिक संग्रह न करना का पालन करने की प्रेरणा देता है। इस दौरान सभी जीवों के प्रति करुणा और प्रेम का भाव रखने पर विशेष जोर दिया जाता है।
 
इन आठ दिनों में जैन धर्मावलंबी उपवास रखते हैं, ध्यान करते हैं, धार्मिक ग्रंथों का पाठ करते हैं और दान-पुण्य के कार्य भी करते हैं। यह पर्व जैन समाज में आध्यात्मिक उत्थान और सामुदायिक भावना को सुदृढ़ करता है।
 
अस्वीकरण (Disclaimer) : चिकित्सा, स्वास्थ्य संबंधी नुस्खे, योग, धर्म, ज्योतिष, इतिहास, पुराण आदि विषयों पर वेबदुनिया में प्रकाशित/प्रसारित वीडियो, आलेख एवं समाचार सिर्फ आपकी जानकारी के लिए हैं, जो विभिन्न सोर्स से लिए जाते हैं। इनसे संबंधित सत्यता की पुष्टि वेबदुनिया नहीं करता है। सेहत या ज्योतिष संबंधी किसी भी प्रयोग से पहले विशेषज्ञ की सलाह जरूर लें। इस कंटेंट को जनरुचि को ध्यान में रखकर यहां प्रस्तुत किया गया है जिसका कोई भी वैज्ञानिक प्रमाण नहीं है।ALSO READ: जैन धर्म का सर्वोत्कृष्ट मंत्र है णमोकार महामंत्र
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