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Written By WD Feature Desk
Last Updated : Friday, 27 February 2026 (11:20 IST)

काशी में होली की अनोखी शुरुआत: मसान होली सहित जानिए 5 चौंकाने वाली परंपराएं

AI Picture: Holi being played on the Ghats of Varanasi
Holi 2026: काशी, जिसे दुनिया के सबसे पुराने जीवित शहरों में से एक माना जाता है, वहां की होली बाकी दुनिया से बिल्कुल जुदा है। यहाँ होली केवल रंगों का त्योहार नहीं, बल्कि जीवन और मृत्यु के उत्सव का मिलन है। काशी में होली की शुरुआत रंगभरी एकादशी से हो जाती है। 27 फरवरी 2026 को रंगभरी एकादशी है। यहां काशी की होली और प्रसिद्ध 'मसान होली' से जुड़ी 5 रोचक बातें दी गई हैं।
 

1. रंगभरी एकादशी से शुरुआत

काशी में होली का औपचारिक आगाज़ रंगभरी एकादशी से होता है। इस दिन बाबा विश्वनाथ का विशेष श्रृंगार होता है और उन्हें पालकी में बैठाकर नगर भ्रमण कराया जाता है। भक्त बाबा पर अबीर और गुलाल उड़ाते हैं, जिससे पूरा शहर गुलाबी हो जाता है।
 

2. चिता भस्म से होली (मसान होली)

वाराणसी के मणिकर्णिका घाट पर खेली जाने वाली 'मसान होली' पूरी दुनिया में अद्वितीय है। रंगभरी एकादशी के अगले दिन, शिवभक्त जलती चिताओं के बीच एक-दूसरे पर चिता की भस्म (राख) फेंककर होली खेलते हैं। मान्यता है कि भगवान शिव श्मशान के राजा हैं और वे अपने गणों (भूत, प्रेत, पिशाच) के साथ यहाँ होली खेलने आते हैं। 

ऐसी मान्यता है कि शिव जी अपने विवाह के उपरांत पहली बार काशी पहुंचे थे, उस दिन लोगों ने होली खेलकर खुशियां मनाई थीं। इस उत्सव में सारे देवी-देवता इकट्ठा हुए थे। शिव पुराण और दुर्गा सप्तशती जैसे प्रमुख धार्मिक ग्रंथों में वर्णित है कि उल्लास के इस मौके पर शंकर भगवान के प्रिय गण भूत-प्रेत, यक्ष और गंधर्व इस उत्सव से वंचित रह गए। इसके बाद भोलेनाथ ने फाल्गुन माह के शुक्ल पक्ष की द्वादशी पर मणिकर्णिका घाट पर श्मशान में अपने गणों के साथ के साथ भस्म की होली खेली थी। यहीं से काशी में मसान की राख से होली खेलने की परंपरा चली आ रही है। 
 

3. 'कबीरा सा रा रा' की गूंज

काशी की होली में संगीत और व्यंग्य का गहरा पुट होता है। यहाँ की गलियों में 'कबीरा सा रा रा' की गूंज सुनाई देती है। यह एक प्रकार की लोक गायकी और हास-परिहास है, जहाँ लोग एक-दूसरे पर प्रेमपूर्ण छींटाकशी करते हुए फाग गाते हैं।
 

4. ठंडई और भंग का प्रसाद

बनारस की होली बिना ठंडई के अधूरी है। यहाँ के केसरिया दूध, मेवे और ताजी भांग का मिश्रण होली के उत्साह को दोगुना कर देता है। इसे बाबा का प्रसाद मानकर लोग बड़े चाव से ग्रहण करते हैं।
 

5. गंगा किनारे हुड़दंग और स्नान

होली के दिन अस्सी घाट से लेकर दशाश्वमेध घाट तक रंगों का सैलाब उमड़ता है। लोग पहले जमकर अबीर-गुलाल खेलते हैं और फिर दोपहर में माँ गंगा में डुबकी लगाकर खुद को साफ करते हैं। गंगा किनारे बजने वाले डमरू और ढोल इस माहौल को दिव्य बना देते हैं।
 
एक खास बात: काशी की होली 'मृत्यु' को अशुभ नहीं मानती, बल्कि उसे उत्सव की तरह स्वीकार करती है। यही कारण है कि यहाँ श्मशान की राख भी 'गुलाल' बन जाती है।
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