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कही-अनकही 6 : वीकेंड स्पेशल

लघुकथा
'हमें लगता है समय बदल गया, लोग बदल गए, समाज परिपक्व हो चुका। हालांकि आज भी कई महिलाएं हैं जो किसी न किसी प्रकार की यंत्रणा सह रही हैं, और चुप हैं। किसी न किसी प्रकार से उनपर कोई न कोई अत्याचार हो रहा है चाहे मानसिक हो, शारीरिक हो या आर्थिक, जो शब्दों में बयां नहीं किया जा सकता, क्योंकि शायद वह इतना 'आम' है कि उसके दर्द की कोई 'ख़ास' बात ही नहीं। प्रस्तुत है एक ऐसी ही 'कही-अनकही' सत्य घटनाओं की एक श्रृंखला। मेरा एक छोटा सा प्रयास, उन्हीं महिलाओं की आवाज़ बनने का, जो कभी स्वयं अपनी आवाज़ न उठा पाईं।'
 
 
दृश्य 1: वीकेंड-1
‘एना, आज रात हमें मेरे भाई के घर खाने पर जाना है...’
 
‘ठीक है, चलते हैं... भैया के बेटे के लिए कुछ ले चलेंगे... बहुत ही प्यारा है वो...’
 
‘अच्छा तुम मेरे लिए एक काम करोगी? मेरे लिए? वहां दुपट्टा अपने सिर पर रख लेना... मेरे लिए?’
 
‘तुम्हारे लिए... खैर मुझे नहीं लगता कि भैया या उनके घरवालों को तकलीफ होती है अगर बहु बिना सिर ढके बाकि परिवार के सदस्यों के ही जैसे घर में रहे... भाभी खुद नहीं रखती सिर पर दुपट्टा... वैसे भी मैं सलवार-कुर्ती ही पहन रही हूं...’
 
 
दृश्य 2: वीकेंड-2
‘एना, आज इलाटियन रेस्त्रां चलें मेरे कजिन के साथ?’
 
‘हां... चलो...’
 
‘और एना, प्लीज कुछ अच्छा वेस्टर्न पहन लो... जीन्स-टॉप... और इतनी ही चिंता है की मोटी दिखोगी तो जिम जाना शुरू करो... सिर्फ डाइटिंग और घर 
 
के काम से तुम कभी दुबली होने से रहीं...’
 
दृश्य 3 : वीकेंड-3
‘एना, आज वो पास के पार्क में चलें?’
 
‘सच में? हम दोनों?’
 
‘हां, मैंने मेरी बहन को कहा है, वो भी आ जाएगी ... वो वैसे भी घर पर बोर हो रही होगी...’
 
 
दृश्य 4 : वीकेंड-4
‘एना, आज मेरे कुछ रिश्तेदारों के साथ बाहर चलना है शाम को...बड़ी अच्छी जगह है... वहां कुछ एडवेंचर स्पोर्ट्स भी हैं...’
 
‘हां, मुझे तो कब से जाना था वहां तुम्हारे साथ...’
 
 
दृश्य 5: वीकेंड-5
‘एना, आज वो स्ट्रीट-फ़ूड जॉइंट चलें?’
 
‘हां चलो...’
 
‘हां मेरा भाई वहीं रहता है... उसको भी बुला लिया है मैंने...’
 
 
दृश्य 6: वीकेंड-6
‘एना, चलो आज मामा के घर जाना है... जबसे शादी हुई तबसे बुला रहे हैं...’
 
‘आदि, किसी एक वीकेंड हम सिर्फ हमारे लिए रख सकते हैं क्या...मतलब... जबसे शादी हुई है, हमेशा किसी न किसी के साथ ही हर वीकेंड बिता रहे हैं... किसी एक वीकेंड बस हम दोनों चलें क्या कहीं? एक दिन की छोटी ट्रिप पर चलें या बस पार्क चलें... बस हम दोनों?’
 
‘हर वीकेंड? दो हफ़्तों से नहीं मिला मैं मेरी बहन से... मुझे भी तो याद आती है... और तुमको जाना है तो तुम टिकट बुक कर लो... चल लेंगे...’
 
‘टिकट तो कर दूंगी मैं, लेकिन ऐसे जबरदस्ती थोड़ी न ले जाना चाहती हूं... समझ नहीं आता तुम कहीं मेरे साथ में चलने में क्यों कतराते हो... हमेशा कोई साथ क्यों चाहिए मेरे अलावा?’
 
‘तुम्हारे पास कोई बेहतर प्लान है? नहीं न? तो फिर मेरा प्लान ही चलेगा... और वैसे भी मुझे शांति भरा वीकेंड चाहिए... तुम्हारे साथ हर घंटे बस बहस ही होती है... इसलिए मुझे बेहतर लगता है कि कोई और हमारे साथ हो... मुझे भी अच्छी कंपनी चाहिए पूरे सप्ताह की थकान के बाद...’ 
 
प्रेम विवाह के बाद जब पति कुछ पल भी अपनी पत्नी के साथ न बिताना चाहे, तो वहां प्रेम कैसा? खैर, ये तो ‘कही-अनकही’ बातें हैं, क्योंकि आज भी न जाने कितनी लड़कियां उम्मीदों से शादी करती हैं और फिर उन्हीं उम्मीदों का गला घोंट दिया जाता है, उन्हीं लड़कियों पर दोषारोपण कर के। आप क्या करते? 
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