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हिन्दी कविता : पतंग हूं मैं...

sankranti
प्यार और विश्वास से
मांजा सूता,
तो कटूंगी नहीं।
रहूंगी हरदम,
तुम्हारे साथ।
क्योंकि-
उड़ जाऊं चाहे जितनी दूर
गगन में ऊंचे,
घिरी तो रहेगी
सदा ही,
तुम्हारे हाथ।
 
पतंग हूं मैं;
लेकिन डोर है जरूरी,
तुम्हारे सहयोग की तरह,
जानती हूं उड़ न पाऊंगी
बंधे बिना तुमसे।
तुम्हारी उड़ंची बिना
कैसे सवार हो
समीर पर,
पहुचूंगी व्योम तक
पतंग हूं मैं;
उड़ती नहीं प्रतिकूल,
 
बहकर सबके अनुकूल,
कोशिश करती हूं,
जीवन सहज हो।
जानती हूं बही प्रतिकूल 
पवन के,
तो हो सकती हूं
छिन्न-भिन्न, तार-तार।
जा न पाऊंगी फिर
कभी आसमां के पास।
 
सदा खींचकर
न रख पाओगे मुझे,
ढील भी देना होगी
कभी-कभी।
जिंदगर चलती रहे ताकि
शीतल, मद्दम,
सुहानी बयार-सी।
खुशियों की उड़ान
देख मेरी,
 
जानती हूं
खुश होओगे तुम भी।
भूल जाओगे मेरी
खुशी देख,
हाथ कटने का
गम भी।
 
उड़ना चाहती हूं
खूब ऊंचे आसमान में
बिना इस डर से 
कि कट भी सकती हूं।
 
आसमान...
मेरी आशाओं का,
मेरी बुलंदियों का,
सफलताओं का,
खुशियों का,
जो छू पाऊंगी
तुम्हारे प्रेम और सहयोग की
डोर की मदद से।
थाम लो मुझे
खींचो नहीं,
उड़ना चाहती हूं मैं
खूब ऊंचे आकाश में।
 
जीवन के सारे
रंग समेटे,
उड़ती हूं तलाशने
अपना, एक मुट्ठी आसमान।
चाहती हूं बस!
कटने न दो कभी,
कट भी जाऊं
दुर्भाग्य से तो,
जानती हूं
लुटने न दोगे कभी।
सहेज लोगे,
प्यार का लेप लगा।
बांध लोगे, फिर मुझे
एक नये धागे से 
प्यार और विश्वास के।
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