भागती-दौड़ती जिंदगी, समय की तथाकथित गंभीर कमी, भागते-दौड़ते खाना निपटाना, पौष्टिक भोजन के प्रति एक किस्म की गंभीर उपेक्षा, और तन-मन व बुद्धि के सुस्वास्थ्य के लिए अ त्यंत ही जरूरी भोजन जैसी अति महत्वपूर्ण, सम्माननीय तथा समयसाध्य दिनचर्या को अनावश्यक बोझ मानते हुए, उसके प्रति निपटाऊ और चलताऊ दृष्टिकोण अपनाना आदि ने हमें अनेक अवांचित स्थितियों का गुलाम और शिकार बना दिया है।
इस अंतहीन भागदौड़ भरी जीवनचर्या से अनावश्यक तनाव, मानसिक अस्थिरता और बात-बात पर क्रोध एवं चिड़चिड़ापन हमा रे हमसफर बन बैठे हैं और फिर वे अनायास ही मनोशारीरिक बीमारियों में रूपांतरित हो जाते हैं। दुख और आश्चर्य का विषय तो यह है कि जानते और भोगते हुए भी हम संभलने के बजाय अनिवार्य या अपरिहार्य मानकर ढोए जा रहे हैं और अपनी संतानों को भी उसी कुएं में अपने हाथों से धकेलने में आनंद का अनुभव कर रहे हैं।

समय की कमी के चलते, माइक्रोवेव ओवन(आविष्कार-सन् 1967) आज हमारे आधुनिक समाज में रसोईघर का अनिवार्य अंग बन चुका है। जल्दी से खाना गर्म करना हो, सब्जियां पकाना हो, केक या पिज्जा बनाना हो, यानी चपाती को छोड़ दिया जाए तो अनेक व्यंजन माइक्रोवेव ओवन की मदद से फटाफट बनाने का चलन तेजी से व्यापक हो गया है। उसकी त्वरित ऊर्जा ने कस्बों, शहरों और महानगरों के परिवारों को अपना कायल बना लिया है।
माइक्रोवेव ओवन किस तरह काम करता है

