वासंती कविता : आओ बसंत
श्रीमती गिरिजा अरोड़ा | Saturday,February 9,2019
आओ बसंत, छाओ बसंत पुलकित हो मन, आनंद मगन फूलों के रंग, परागों के संग सरोवरों में बन कर कमल
हिन्दी कविता : सांप
श्रीमती गिरिजा अरोड़ा | Friday,August 3,2018
सांप मैं डरती हूं तुमसे तुम्हारे फुंफकारने से तुम्हारे डंसने से मैंने सुना है तुम्हारी फुंफकार के
कविता : एक प्यारा सा बादल
श्रीमती गिरिजा अरोड़ा | Tuesday,June 26,2018
अक्सर आँखों में आकर, कर जाता गीला काजल, एक प्यारा सा बादल, मैं छुईमुई सी घबराती, गरजन सी बातें करता...
कविता : मैंने लगाई थी एक अर्जी
श्रीमती गिरिजा अरोड़ा | Friday,June 8,2018
मैंने लगाई थी एक अर्जी, धूप के दरबार में, मान ली सूर्य ने, जो भी थी फरियाद वे।
कविता : कृतज्ञता
श्रीमती गिरिजा अरोड़ा | Friday,April 27,2018
मेरे प्रभु, रहा संग तू, न मैं ये भूलूं, मेरे प्रभु, असमर्थता की निर्जीवता में, तू विश्वास के प्राण भरता रहा, निराशा के ...
कविता : तुमने कहा था
श्रीमती गिरिजा अरोड़ा | Wednesday,April 18,2018
तुमने कहा था साथ रखना, सब होगा अच्छा विश्वास रखना। कोई बैरी नहीं सपनों का, स्वप्न मगर कुछ खास रखना।
कविता : क्या होता जो गम न होता ?
श्रीमती गिरिजा अरोड़ा | Wednesday,February 21,2018
क्या होता जो इस दुनिया में गम न होता? सच पूछो तब हंसने का भी मौसम न होता।
रंगबिरंगी कविता : तितलियां
श्रीमती गिरिजा अरोड़ा | Saturday,January 13,2018
जब उड़ेंगी रंग भरेंगी तितलियां, हवाओं में आकर्षण रहेंगी तितलियां। ढूंढते हो कहां यहां-वहां, संग फूलों के मिलेंगी ...
हिन्दी कविता : क्या होता जो इस दुनिया में गम न होता?
श्रीमती गिरिजा अरोड़ा | Tuesday,December 5,2017
क्या होता जो इस दुनिया में गम न होता? सच पूछो तब हंसने का भी मौसम न होता। कांटों की जो सेज न होती, फूल कहां पर सोते? जो ...
हिन्दी कविता : मन की गांठ
श्रीमती गिरिजा अरोड़ा | Friday,August 25,2017
मन की गांठ बोई नहीं जाती ग्लैडुला की गांठ की तरह जो अपनी बगिया महकाए भाए आँखों को मन की गांठ बांधी नहीं जाती

