दीपा शाही और राजन शाही के शो 'अनुपमा' ने एक बार फिर ऐसा मुद्दा उठाया है, जो हमारे आसपास हर घर में मौजूद है, लेकिन अक्सर लोग उसे नजरअंदाज कर देते हैं। बुढ़ापा वो समय होता है जब बुजुर्गों को सबसे ज्यादा साथ, बातचीत और अपनापन चाहिए होता है। मगर यहीं पर धीरे-धीरे अकेलापन भी घर करने लगता है।
शो का नया ट्रैक इसी खामोश दर्द को संवेदनशीलता के साथ दिखाता है और बीच-बीच में हल्की-सी मस्ती भी डाल देता है, ताकि कहानी बोझिल न लगे। शो में अरविंद वैद्य द्वारा निभाए गए बाबूजी हमेशा से ऐसे इंसान रहे हैं जो अपने परिवार के लिए हर वक्त खड़े रहे। घर में जब भी किसी को जरूरत पड़ी, बाबूजी ने बिना शर्त साथ दिया।
लेकिन कहानी का सबसे भावुक पहलू यह है कि बाबूजी खुद कभी किसी से बहुत उम्मीद नहीं करते, क्योंकि उन्हें लगता है कि सब अपनी-अपनी जिम्मेदारियों में व्यस्त हैं। फिर भी, एक इंसान होने के नाते उन्हें ध्यान, प्यार और थोड़ी-सी अहमियत चाहिए, जो अक्सर उन्हें नहीं मिलती।
शो में यह भी दिखाया गया है कि बाबूजी जब कुछ बोलना चाहते हैं तो उनकी बात बीच में काट दी जाती है। कभी उन्हें नए ट्रेंड्स समझ न आने पर मजाक का पात्र बना दिया जाता है। और यही वो छोटी-छोटी बातें हैं, जो किसी बुजुर्ग को अंदर से चुपचाप तोड़ देती हैं।
दोस्त की पुकार: दिल्ली जाना जरूरी था, पर कोई फुर्सत में नहीं
कहानी में नया मोड़ तब आता है जब बाबूजी को उनके एक पुराने दोस्त का फोन आता है। दोस्त रोते हुए मदद मांगता है और बताता है कि उसके बच्चे उसके साथ अच्छा व्यवहार नहीं कर रहे। बाबूजी यह सुनकर बेचैन हो जाते हैं और तय करते हैं कि उन्हें दिल्ली जाकर दोस्त की मदद करनी होगी। लेकिन समस्या वही शाह हाउस में हर कोई इतना बिजी है कि बाबूजी को दिल्ली ले जाने के लिए किसी के पास समय नहीं। बाबूजी खुद को बेबस महसूस करते हैं।
यहीं पर अनुपमा आगे आती है। वह बाबूजी की परेशानी समझती है और बिना ज्यादा सोच-विचार के उनके साथ दिल्ली जाने का फैसला कर लेती है। यह हिस्सा कहानी का सबसे खूबसूरत पॉइंट बन जाता है, क्योंकि यहां अनुपमा सिर्फ एक बहू नहीं, बल्कि एक इंसान बनकर सामने आती है, जो बुजुर्ग की जरूरत को समय पर पहचान लेती है।
दिल्ली पहुंचकर बाबूजी और अनुपमा को जो सच पता चलता है, वह काफी दुखद है। बाबूजी के दोस्त के बच्चों ने उसे उसकी पत्नी से अलग कर दिया है और दोनों को अलग-अलग रहने पर मजबूर कर दिया गया है। सिर्फ इतना ही नहीं, बच्चे उनके साथ बदतमीजी भी करते हैं।
यह ट्रैक उन परिवारों के लिए आईना है, जहां बुजुर्ग माता-पिता को बोझ समझ लिया जाता है, और उनकी भावनाओं की कीमत शून्य कर दी जाती है। कहानी को एक दिलचस्प मोड़ देते हुए अनुपमा और बाबूजी एक प्लान बनाते हैं। वे दोस्त के घर पर दिल्ली में रहने वाले अमीर रिश्तेदार बनकर पहुंचते हैं। “दुबई” वाला तड़का इस ट्रैक में हल्का-सा मजेदार ट्विस्ट जोड़ देता है।
मिशन पूरा: हालात बदले, रिश्ते सुधरे
धीरे-धीरे कहानी में लोग बदलते हैं, हालात सुधरते हैं और अनुपमा तथा बाबूजी अपनी कोशिश में सफल हो जाते हैं। इस पूरे सीक्वेंस का सबसे बड़ा संदेश यही है कि समस्या सिर्फ जनरेशन गैप नहीं है, बल्कि इमोशनल गैप भी है—जो समय रहते भरना जरूरी है।
इस ट्रैक की सबसे मजबूत बात यह है कि यह दर्शकों को यह समझाता है कि बुजुर्गों को कोई बड़े सरप्राइज, महंगे गिफ्ट या दिखावे वाली सेवा नहीं चाहिए। उन्हें चाहिए बस आपका साथ, आपकी मौजूदगी और थोड़ी-सी बातचीत। आज के समय में क्वालिटी टाइम एक लग्जरी बन चुका है। लेकिन अगर वह समय अपने घर के बुजुर्ग माता-पिता के साथ बिताया जाए, तो इससे बेहतर निवेश शायद कोई नहीं।
इस ट्रैक पर बात करते हुए अरविंद वैद्य ने कहा कि वह राजन शाही और दीपा शाही के आभारी हैं कि उन्होंने ऐसा सीक्वेंस शो में दिखाया, जिस पर आमतौर पर लोग खुलकर बात नहीं करते, जबकि यह लगभग हर घर की सच्चाई है। उन्होंने यह भी कहा कि समाज में बुढ़ापे से जुड़ी समस्याएं एक बड़ी चिंता हैं और उन्हें खुशी है कि शो के जरिए एक जरूरी संदेश लोगों तक पहुंच रहा है।