विश्व की प्राचीनतम् संस्कृति भारतीय सनातन हिन्दू संस्कृति में पर्यावरण को देवतुल्य स्थान दिया गया है। यही कारण है कि पर्यावरण के सभी अंगों को जैसे जल, वायु, भूमि को देवताओं से जोड़ा गया हैं, देवता ही माना गया है। हिन्दू दर्शन में मूल ईकाई जीव में मनुष्य में पंच तत्वों का समावेश माना गया है। मनुष्य पांच तत्वों जल, अग्नि, आकाश, पृथ्वी और वायु से मिलकर बना है।
वैदिक काल से इन तत्वों के देवता मान कर इनकी रक्षा का करने का निर्देश मिलता है इसलिए वेदों के छठे अंग ज्योतिष की बात करें तो ज्योतिष के मूल आधार नक्षत्र, राशि और ग्रहों को भी पर्यावरण के इन अंगों जल-भूमि-वायु आदि से जोड़ा गया है और अपने आधिदैविक और आधिभौतिक कष्टों के निवारण के लिए इनकी पूजा-पद्धति को बताया गया है।
भगवान श्रीकृष्ण ने स्वयं गीता में कहा है–
'अश्वत्थ: सर्व वृक्षा वृक्षाणां अर्थात् वृक्षों में पीपल मैं हूं...'
'अश्वत्थ: सर्व वृक्षा वृक्षाणां अर्थात् वृक्षों में पीपल मैं हूं...'
मां जगदंबा ने स्वयं कहा है-
'अहं ब्रह्म-स्वरूपिणी, मत्तः प्रकृति पुरुषात्मकं जगत शून्यं चाशून्यं च'
'अहं ब्रह्म-स्वरूपिणी, मत्तः प्रकृति पुरुषात्मकं जगत शून्यं चाशून्यं च'
अर्थात्- प्रकृति पुरुषमय विश्व मुझी में, मैं हूं शून्यअशून्य, मैं हूं ब्रह्म-स्वरूपिणी, सर्वमयी मुझको जो जाने, वही मनुज है धन्य...।
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